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shlok in sanskrit for class 7 | संस्कृत श्लोक

shlok in sanskrit for class 7

shlok in sanskrit for class 7 – आज हम आप सभी कक्षा 7 वालों छात्रों के लिए संस्कृत श्लोक लेकर आए हैं

ये संस्कृत श्लोक को  आप बहुत ही आसानी से याद कर सकते हैं क्योकि हमने इन सभी श्लोको का अर्थ बहुत ही आसान शब्दो मे समझाया हैं

फ़ाइनल exam मे अक्सर श्लोक लिखने के लिए आता हैं तो इन श्लोको को जरूर याद कर ले

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sanskrit shlok class 6 Hindi Online Test || Hindi Test For Competitive Exam
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Shlok – 1

About– इस श्लोक के माध्यम से अन्न, जल और सुंदर वचन की महत्ता को बताया गया है |

पृथिव्या त्रीणि रत्नानि जमन्नंसुभाषितम् |
मूढैः पाषाणखण्डेषु रत्नसंज्ञा विधीयते ||

पृथ्वी पर तीन ही रत्न हैं, अन्न, जल और सुंदर वचन | लेकिन मूर्ख लोगों ने पत्थर के टुकड़ों (हीरा, पन्ना, मूंगा आदि) को ही रत्न की संज्ञा दी है अर्थात पत्थर के टुकड़ों को अन्न, जल और सुंदर वचन की जगह रत्न कहा है |

व्याख्या– हमें एक विवेकशील मनुष्य की तरह सोचना चाहिए और और विभिन्न प्रकार की निरर्थक भ्रांतियों में नहीं फंसकर इस श्लोक में लिखित बातों पर विचार करना चाहिए |

Shlok – 2

About– इस श्लोक के माध्यम से सत्य की महत्ता को समझाया गया है |

सत्येन धार्यते पृथ्वी सत्येन तपते रविः |
सत्येन वाति वायश्च सर्वं सत्ये प्रतिष्ठतम् ||

सत्य के द्वारा पृथ्वी धारण की जाती है, सत्य से ही सूर्य तपता है अर्थात सत्य से ही सूर्य में तपन अर्थात ऊष्मा है |
सत्य से ही हवा चलती है अर्थात बहती है | सारा संसार सत्य के द्वारा ही प्रतिष्ठित है |

संदेश- हमें अपने मन, कर्म और वचन से सदैव में ही नियत रहना चाहिए |

Shlok – 3

About– इस श्लोक में पृथ्वी एवं उसपे उपलब्ध रत्नों की महत्ता को उजागर किया गया है |

दाने तपसि शौर्ये च विज्ञाने विनये नये |
विस्मयो न हि कर्तव्यो बहुरत्ना वसुन्धरा ||

दान , तप , वीरता , विज्ञान और नीति इनके विषय में कभी किसी को विस्मित होना ही नहीं चाहिये। क्योंकि पृथ्वी बहुत से रत्न भरे पड़ी है।

संदेश– कभी भी अभिमान नहीं करना चाहिए, कि हम ही सबकुछ हैं, क्योंकि पृथ्वी पर आपके अलावा बहुत सारे विद्वान लोग भी है | उन्हें देखकर हमें उनके दिव्य गुणों को अपने अंदर समाहित करना चाहिए |

Shlok – 4

About– इस श्लोक के माध्यम से सज्जन व्यक्तियों की महत्ता को बखूबी बताया गया है |

सभ्दिरेव सहासीत सद्भिः कुर्वीत सङ्गतिम् |
सभ्दिर्विवादं मैत्रीं च नासभ्दीः किञ्चिदाचरेत्।

सज्जन लोगो के साथ ही रहना चाहिए, सज्जन लोगो की ही संगति करनी चाहिए। मित्रता, लड़ाई और बहस भी सज्जन लोगो के साथ ही करनी चाहिए। दुर्जनों के साथ किसी प्रकार का सम्बन्ध नहीं रखना चाहिए या आचरण नहीं करना चाहिए।

संदेश– सज्जनों की संगति सदैव मंगल करने वाली है | वहीं इसके विपरित दुर्जन अर्थात बुरी आदतों वाले व्यक्तियों की संगति सदैव दुखदायक है |

Shlok – 5

About– इस श्लोक के माध्यम से मनुष्य के चातुर्य एवं विवेकशीलता के महत्व को समझाया गया है |

धन्धान्यप्रयोगेषु विद्यायाः संग्रहेषु च |
आहारे व्यवहारे च त्यक्तलज्जः सुखी भवेत् ||

धन और धन्य अर्थात अन्न के प्रयोग में तथा विद्या के संग्रह में कभी भी संकोच नहीं करना चाहिए । व्यव्हार और आहार अर्थात् भोजन में लज्जा का त्याग करने वाला ही सुखी रहता है।

संदेश– हमें कभी भी व्यवहार और आहार में किसी भी तरह से लज्जा नहीं करना चाहिए | ऐसा कारण हमारे लिए मानसिक एवं शारीरिक दुखों का कारण हो सकता है |

Shlok – 6

About– इस श्लोक में क्षमा की महत्ता को समझाया गया है |

क्षमावशीकृतिर्लोके क्षमया किं न साध्यते |
शान्तिखडगः करे यस्य किं करिष्यति दुर्जनः |

इस संसार में क्षमा वशीकरण है अर्थात के द्वारा सबको वशीभूत किया जा सकता है | अतः क्षमा के द्वारा क्या सिद्ध नहीं हो सकता ?
इस व्यक्ति के हाथ में यह शांति रूपी तलवार है उसका दुर्जन व्यक्ति भी क्या कर सकता है ?
अतः क्षमा के द्वारा सबकुछ किया जा सकता है |

संदेश– हमें क्षमा रूपी महान गुण को अपने छोटे से जीवन में ग्रहण करके महान बनने की ओर अपने मन को लगाना चाहिए |

shlok in sanskrit for class 7

प्रातः काले ईशं स्मृत्वा, पितरौ प्रणमामि।
नित्यं कर्म च कृत्वोद्यानं, गत्वा विचरामि।।

स्नानात् पूर्वं प्राणायाम, तदनु व्यायामम्।
वृष्टिर्भवतु वा झञ्झावतो, हिमं पतेत् कामम्।।

गृहमागत्य दुग्धं पीत्वा, पठामि निजपाठम्।
ततो भोजनं करोमि नित्यं, षड्रससंयुक्तम्।।

विद्यालये च गुरूवर्याणां, करोमि सम्मानम्।
श्रद्धायुक्तो भूत्वैवाहम्, अर्जयामि ज्ञानम्।।

सायङ्काले क्रीडाक्षेत्रे, गत्वा क्रीडामि।
देवदर्शनं ततो भोजनं, पाठं स्मरामि।।

शयनात् पूर्वं राष्ट्रचिन्तनं, नित्यं कर्तव्यम्।
भारतमातुः दिव्यमन्दिरं, भवतु पुनः भव्यम्।।

रेफादौ च मकारोऽन्ते वाल्मीकिः यस्य गायकः।
सर्वश्रेष्ठं यस्य राज्यं वद कोऽसौ जनप्रियः।

शोभितोऽस्मि शिखण्डेन दीर्धेः पौरलङ्कृतः
राष्ट्रिया विहङ्गश्चास्मि, नृत्यं पश्यन्ति में जनाः।

न तस्यादिः न तस्यान्त: मध्ये यः तस्य तिष्ठति।
तवाप्यस्ति ममाप्यस्ति यदि जानासि तद्वद।

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