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10th class sanskrit shlok | संस्कृत श्लोक

10th class sanskrit shlok

10th class Sanskrit shlok – दोस्तो आज हम आप सभी के लिए 10th class Sanskrit shlok लेकर आए हैं

श्लोक के साथ साथ हिन्दी अनुवाद भी रहेगा हैं ओर कठिन शब्दो का शब्दार्थ भी हम बताएँगे

प्रत्येक श्लोक का सही ओर सरल ,अनुवाद ओर अर्थ भी समझाएँगे

इन श्लोको आप आसानी से याद भी कर सकते हैं ओर इन श्लोक से जुड़े महत्वपूर्ण प्रश्न उत्तर भी आप को मिलेंगे

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10th class sanskrit shlok

Class 10 Hindi Chapter 6 सुभाषितानि (सुन्दर-वचन)

sanskrit shlok

प्रस्तुतोऽयं पाठः विविधग्रन्थात् सङ्कलितानां दशसुभाषितानां सङ्ग्रहो वर्तते। संस्कृतसाहित्ये सार्वभौमिकं सत्यं प्रकाशयितुम् अर्थगाम्भीर्ययुता पद्मयी प्रेरणात्मिका रचना सुभाषितमिति कथ्यते। अयं पाठांश: परिश्रमस्य महत्त्वम्, क्रोधस्य दुष्प्रभावः , सामाजिक महत्त्वम्, सर्वेषां वस्तूनाम् उपादेयता, बुद्धे: वैशिष्ट्यम् इत्यादीन् विषयान् प्रकाशयति।

सरलार्थ – संस्कृत कृतियों के जिन पद्यों या पद्यांशों में सार्वभौम सत्य को बड़े मार्मिक ढंग से प्रस्तुत किया गया है, उन पद्यों को सुभाषित कहते हैं। प्रस्तुत पाठ ऐसे 10 सुभाषितों का संग्रह है जो संस्कृत के विभिन्न ग्रंथों से संकलित हैं। इनमें परिश्रम का महत्त्व, क्रोध का दुष्प्रभाव, सभी वस्तुओं की उपादेयता और बुद्धि की विशेषता आदि विषयों पर प्रकाश डाला गया है।

 

आलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपुः ।
नास्त्युद्यमसमो बन्धुः कृत्वा यं नावसीदति ॥1॥

शब्दार्थः  आलस्यं – आलस्य (Laziness)  हि – ही (only) मनुष्याणां – मनुष्यों के (Of humans) शरीरस्थ: – शरीर में रहने वाला (body dweller) महान् – बहुत बड़ा (huge) रिपुः – शत्रु (Enemy)। नास्त्युद्यमसमो (न +अस्ति उहमसमः) = न – नहीं (No)  अस्ति  है (is) उहमसमः – परिश्रम के समान (Like labor) बन्धुः – मित्र (friend) कृत्वा – करके (By doing)  यं जिसे (to whom) नावसीदति (न+अवसीदति)  – नहीं (No)  अवसीदतिदुःखी होता है 

 

अन्वयः- मनुष्याणाम् शरीरस्थ: आलस्यं हि महान् रिपुः ।
उद्यमसमः बन्धुः न अस्ति ये कृत्वा (मानवः) न अवसीदति।।

सरलार्थ मनुष्यों के शरीर में रहने वाला आलस्य ही बहुत बड़ा शत्रु है। परिश्रम के समान काई मित्र नहीं है, जिसे (परिश्रमकरके (मनुष्य कभी ) दुःखी नहीं होता है।

 

गुणी गुणं वेत्ति न वेत्ति निर्गुणो,
बली बलं वेत्ति न वेत्ति निर्बलः ।
पिको वसन्तस्य गुणं न वायस:,
करी च सिंहस्य बलं न मूषकः ॥2॥

शब्दार्थः – गुणी – गुणी/प्रतिभाशाली/मेधावी (Virtuous)  गुणं – योग्यता/सक्षमता/सामर्थ्य/ गुण (a quality)  वेत्ति- जानता है (knows)। न –नहीं (No)  निर्गुणो- निर्गुण (Qualityless)
बली- 
शक्तिशाली । बलं – शक्ति को (To power) वेत्ति-जानता है (knows) न – नहीं (No) । वेत्ति – जानता है (knows)। निर्बलः – (शक्तिहीन) Powerless। पिको – (पिक:) = कोयल (Cuckoo) । वसन्तस्य – वसंत का (Spring)  गुणं – योग्यता/सक्षमता/सामर्थ्य/ गुण (a quality)  न – नहीं (No) । वायस: – कौआ (crow)। करी -हाथी (Elephant)। च – और (and)  सिंहस्य – शेर का (of lion)  बलं – शक्ति को (To power)। न – नहीं (No) । मूषकः – चूहा (Rat)

अन्वयः – गुणी गुणं वेति, निर्गुण: (गुणं) न वेत्ति, बली बलं वेत्ति, निर्बलः (बलं) न वेत्ति, वसन्तस्य गुणं पिक: (वेत्ति), वायस: न (वेत्ति), सिंहस्य बलं करी (वेत्ति) मुषक: न ।

सरलार्थ- गुणी गुण जानता है, निर्गुण (गुण) नहीं जानता। शक्तिशाली बल जानता है, निर्बल (बल) नहीं जानता।
वसन्त का गुण कोयल (जानती है), कौआ नहीं (जानता है)। सिंह का बल हाथी (जानता है), चूहा नहीं।

 

निमित्तमुद्दिश्य हि यः प्रकुप्यति,
ध्रुवं स तस्यापगमे प्रसीदति ।
अकारणद्वेषि मनस्तु यस्य वै,
कथं जनस्तं परितोषयिष्यति ॥3॥

शब्दार्थः – निमित्तमुद्दिश्य (निमित्तम् + उद्देश्य) = निमित्तम् – कारण/  वजह/प्रयोजन (reason, cause) उद्देश्य – ध्येय,लक्ष्य (objective, purpose aim, goal) हि – ही (only) यः – जो (who)  प्रकुप्यति- ज्यादा गुस्सा करता है (more angry)
ध्रुवं – निश्चित
 (fixed) ।  – स: – वह (he/she)  तस्यापगमे (तस्य + अपगमे) = तस्य – उसका/उसकी (his / her)  अपगमे – खत्म होने पर (Upon finishing) प्रसीदति – खुश होता है (makes happy)
अकारणद्वेषि – 
बिना कारण द्वेष करने वला (hater / Mind which holds enemity without reason)  मनस्तु (मनः +तु )मन मन तु – तो (so/then) यस्य- जिसका (Whose)  वै – {अव्यय} – ज़रूर (sure) । कथं – कैसे (how)  जनस्तं (जन: + तं) = जन: – लोग (The people)  तं – उसको (for him)  परितोषयिष्यति – सन्तुष्ट करेगा (Will satisfy) 

अन्वयः – य: निमित्तम् उद्दिश्य प्रकुप्यति सः तस्य (निमित्तस्य ) अपगमे ध्रुवं प्रसीदति । यस्य मनः अकारणद्वेषि (अस्ति) जन: तं कथं परितोषयिष्यति ।

सरलार्थ- जो (किसी) वजह को लक्ष्य कर अधिक क्रोध करता है वह उसकी ( वजह की) समाप्ति पर खुश होता है। (लेकिन) जिसका मन अकारण द्वेष करने वाला है, उसको मनुष्य कैसे सन्तुष्ट करेगा।

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उदीरितोऽर्थः पशुनापि गृह्यते,
हयाश्च नागाश्च वहन्ति बोधिताः।
अनुक्तमप्यूहति पण्डितो जनः,
परेङ्गितज्ञानफला हि बुद्धयः ॥4॥

शब्दार्थ- उदीरितोऽर्थः (उदीरित:+अर्थः)= उदीरित:-कहा हुआ /उक्त / कथित (said)। अर्थः भावना/मतलब (sense/ meaning) गृह्यते -प्राप्त किया जाता है। पशुना- पशु के द्वारा (By animal) । अपि –भी (Too)  हयाश्च (हया: + च) = हया:– घोड़े (The horses) , च – और (and) । नागाश्च (नागा: + ) = नागा: – हाथी (elephant) च – और (and)  वहन्ति – समझते हैं (Understand) । बोधिताः- बताए गए को
अनुक्तमप्यूहति (
अनुक्तम् + ऊहति ) = अनुक्तम् – न कहा हुआ (untold) । ऊहति – अंदाजा लगाते हैं (guessing) पण्डितो जनः= ज्ञानी पुरुष ।
परेङ्गितज्ञानफला= 
दूसरों के संकेतजन्य ज्ञान रूपी फल वाले  हि= निश्चय ही (surely)। बुद्धयः – बुद्धिमान् (wise people) 

अन्वयः पशुना अपि उदीरित: अर्थ: गृह्यते, हया: नागा: च बोधिताः (भार) वहन्ति  पण्डितः जन:
अनुक्तम् अपि ऊहति  बुद्धयः हि परेङ्गितज्ञानफला: (भवन्ति )।

सरलार्थ- पशु के द्वारा भी, कहा हुआ sense/भावना/ ग्रहण किया जाता है। (जैसे) घोड़े और हाथी बताए गए को समझते
हैं। ज्ञानी पुरुष न कहे हुए को भी अन्दाजा लगा लेते हैं। बुद्धिमान् ही दूसरों के संकेतजन्य ज्ञान रूपी फल वाले होते हैं।

sanskrit shlok

 

क्रोधो हि शत्रुः प्रथमो नराणाम्,
देहस्थितो देहविनाशनाय ।
यथास्थितः काष्ठगतो हि वह्निः
स एव वह्निर्दहते शरीरम् ॥5॥

शब्दार्थ-क्रोधो = क्रोधः – क्रोध (anger)  हि- ही (only)। शत्रुः- शत्रु / दुश्मन (enemy) । प्रथमो- प्रथम: – प्रथम / पहला (the first) । नराणाम्- मनुष्यों के (of humans) 
देहस्थितो – शरीर में स्थित / शरीर में विराजमान (located in body) देहविनाशनाय – शरीर के विनाश के लिए 
(for the destruction of the body)
यथास्थितः (यथा + स्थितः) = यथा – जैसे
 (like) । स्थितः – स्थित (situated)  काष्ठगतो= काष्ठगत: – लकड़ी में स्थित (located in wood) । हि- निश्चय ही (surely) । वह्निः – आग (the fire) 
स – स
: – वह (he/she) । एव – निश्चित (केवल) (sure/only) । वह्निर्दहते (वह्नि:+ दहते) = वह्नि: – आग (the fire) । दहते– जला देता है (burns)  शरीरम्- शरीर को (to body) सः एव वैसे ही (just like that)  हि –क्योंकि (since/because)

अन्वयः- हि नराणाम् देहविनाशनाय प्रथम: शत्रुः देहस्थितः क्रोधः।हि यथा काष्ठगतः स्थित: वह्निः काष्ठम् एव दहते, सः एव (क्रोधः एव) शरीर (दहते)।

सरलार्थ- निश्चय ही मनुष्यों के शरोर के विनाश के लिए प्रथम शत्रु क्रोध है। क्योंकि, जैसे लकड़ी में स्थिह आग
लकड़ी को निश्चित जलाती है, वैसे ही (क्रोध निश्चित) शरीर को (जला देता है।)

Note: हि – निश्चय हीक्योंकि (surely/because / only) 

 

मृगा मृगैः सङ्गमनुव्रजन्ति,
गावश्च गोभिः तुरगास्तुरङ्गैः ।
मूर्खाश्च मूर्खैः सुधियः सुधीभिः ,
समान-शील-व्यसनेषु सख्यम् ॥6॥

शब्दार्थ- मृगा – मृगा: – हिरण/ हरिन { For word “हिरण/ हरिन”, here एकवचन and बहुवचन are same} (deers/antelopes) । मृगैः – हिरणों के साथ (with deers) – सङ्गमनुव्रजन्ति (सङ्गम् + अनुव्रजन्ति ) = सङ्गम् – मिलाप / दो वस्तुओं के मिलने की क्रिया (confluence/conjuction) । अनुव्रजन्ति – अनुसरण करते हैं (Follows) 
गावश्च (गाव
+ च ) = गाव– गाए (cows)   – और (and) । गोभिः – गायों के साथ( with cows)  तुरगास्तुरङ्गैः (तुरगा: + तुरङ्गैः) = तुरगा: – घोड़े (horses)  तुरङ्गैः – घोड़ों के साथ (with horses) 
मूर्खाश्च (मूर्खा: + च) = मूर्खा: – मूर्ख लोग
 (stupid people)   मूर्खैः – मूर्खों के साथ (with fools)  सुधियः – विद्वान् लोग (wise peoples)  सुधीभिः – विद्वानों के साथ (with wise peoples) । समान-शील-व्यसनेषु = समान  समान रूप से (equally) । शील– शील / नम्रता / विनय (modesty/ politeness) । व्यसनेषु – स्वभाव (होने) पर (Having nature) सख्यम् – मित्रता (friendship) 

अन्वयः- मृगा: मृगैः (सह), गाव: गोभि: (सह), तुरगा: तुरङ्गैः (सह), मूर्खा: मूर्खैः (सह), सुधियः सुधिभिः (सह)
सङ्गम् अनुव्रजन्ति। समान-शील-व्यसनेषु सख्यम् (भवति)।

सरलार्थ- हिरण, हिरणों के साथ; और गायें, गायों के साथ; घोड़ेघोड़ों के साथ; और मूर्ख लोग मूर्खों के साथ; विद्वान् लोग
विद्वानों के साथ (मिलाप) अनुसरण करते हैं। समान शील और स्वभाव (होने) पर मित्रता होती है।

 

सेवितव्यो महावृक्षः फलच्छायासमन्वितः ।
यदि दैवात् फलं नास्ति छाया केन निवार्यते ॥7॥

शब्दार्थ सेवितव्यो = सेवितव्यसंरक्षण करना चाहिए (Must protect) महावृक्षः – महान् वृक्ष/ बड़ा वृक्ष (big tree) । फलच्छायासमन्वितः – फल और छाया से भरा हुआ (containing fruit and shade)
यदि – यदि/अगर
 (if/whether)  दैवात्– इत्तिफ़ाक़ से (by chance) । फलं- फल (fruit) । नास्ति– (न + अस्ति) =  – नहीं ( no)  अस्ति– है (is) छाया – छाया/ परछाई / साया / प्रतिबिंब (shadow)  केन – किसके द्वारा (By whom) । निवार्यते – रोकी जाती है (is stopped) 

 

अन्वय:- फलच्छायासमन्वितः महावृक्षः सेवितव्यः।
यदि दैवात् फलं नास्ति छाया केन निवार्यते 

सरलार्थ- फल और छाया से युक्त महान् वृक्ष का संरक्षण करना चाहिए। यदि इत्तिफ़ाक़ से फल नहीं है तो छाया किसके द्वारा रोकी जाती है?

 

अमंत्रमक्षरं नास्ति, नास्ति मूलमनौषधम् ।
अयोग्यः पुरुषः नास्ति योजकस्तत्र दुर्लभः ॥8॥

शब्दार्थ- अमंत्रमक्षरं (अमन्त्रम्+अक्षरं) = अमन्त्रम्– मन्त्रहीनबिना मंत्र के (without mantra) । अक्षरं – अक्षर (letter) ।नास्ति (न + अस्ति) = न – नहीं ( no) । अस्ति– है (is)। मूलमनौषधम् (मूलं+अनौषधम्) = मूलं– जड़ (root) अनौषधम्– औषधि से रहित / दवा मुक्त (Drug free)
अयोग्यः-अयोग्य/ मूर्ख/ अनाड़ी
 (ineligible/ /unworthy/inept) । पुरुषः – पुरुष/आदमी/व्यक्ति (person)  नास्ति – (न + अस्ति) =  – नहीं ( no)  अस्ति– है (is)। योजकस्तत्र (योजक: + तत्र) = योजक: -एकत्र करने वाला/जोड़ने वाला/ संयोजक (annectent/conjunctive)। तत्र– वहाँ (there)  दुर्लभः – दुर्लभ / विरला (rare) 

अन्वयः अक्षरं अमन्त्रम् न अस्ति, अनौषधम् मूलं न अस्ति, अग्योग्य: पुरुषः न अस्ति, तत्र योजक: दुर्लभ: ।

सरलार्थ- (कोई भी) अक्षर मन्त्रहीन नहीं है, (कोई भी) जड़ औषधि से रहित नहीं है। (कोई भी) व्यक्ति आयोग्य/नालायक नहीं है, वहाँ (उन्ही गुणों को) संयोजक / एकत्र करने वाला (ज्ञानी का मिलना) दुर्लभ है ।

 

संपत्तौ च विपत्तौ च महतामेकरूपता ।
उदये सविता रक्तो रक्तश्चास्तमये तथा ॥9॥

शब्दार्थ- संपत्तौ – सम्पत्ति में / दौलत में (in property)   – और (and)  विपत्तौ -विपत्ति में / आपदा में /आफ़त में (in disaster)  – और (and)  महतामेकरूपता (महताम् +एकरूपता ) = महताम् – महापुरुषों की (Of great men) । एकरूपता – समानता (uniformity/ analogousness/ equability) 
उदये – उदय होता हुआ
 (rising)  सविता – सूर्य (sun) रक्तो = रक्तः-लाल (red) । रक्तश्चास्तमये (रक्तः +  + अस्तमये) = रक्तः – लाल (red)  च – और (and) । अस्तमये – अस्त होता हुआ (setting)  तथा – और (and) 

 

अन्वय:- महताम् संपत्तौ च विपत्तौ च एकरूपता।
सविता उदये रक्त: तथा अस्तमये च रक्त: ।

OR

महताम् संपत्तौ च विपत्तौ च एकरूपता भवति । यथा सविता उदये रक्तः भवति, तथा एव अस्तमये च रक्तः भवति।

सरलार्थ- महापुरुषों की सम्पत्ति में और विपत्ति में एकरूपता/समानता होती है। जैसे, सूर्य उदय होता हुआ (भी) लाल होता है और अस्त होते हुए (भी) लाल होता है।

 

विचित्रे खलु संसारे नास्ति किञ्चिन्निरर्थकम् ।
अश्वश्चेद् धावने वीरः भारस्य वहने खरः ॥10 ॥

शब्दार्थ-विचित्रे – विचित्र /अनोखा / विलक्षण (bizarre/quaint) । खलु – निश्चय (determination / decision) । संसारे – संसार में (in world ) । नास्ति (न + अस्ति) =न – नहीं ( no) । अस्ति– है (is)।किञ्चिन्निरर्थकम् (किञ्चित् + निरर्थकं) = किञ्चित् -कुछ भी (anything) । निरर्थकं– निरर्थक (Pointless/ fruitless)
अश्वश्चेद् (अश्व:
 + चेत्) अश्व: – घोड़ा (horse) । चेत्- यदि (if)  धावने – दौड़ने में ( in runninig)  वीरः – वीर (Brave) भारस्य – भार के (Of weight) । वहने – ढोने में (to carry)। खरः – गधा (donkey) ।

अन्वयः विचित्रे संसारे खलु किञ्चित् निरर्थकं न अस्ति। चेत् अश्व: धावने वीरः, भारस्य वहने खरः।

सरलार्थ- विलक्षण संसार में निश्चय ही कुछ भी निरर्थक नहीं है। यदि घोड़ा दौड़ने में वीर है तो गधा भार को ढोने में।

10th class sanskrit shlok

Niti sloka class 10 sanskrit नीतिश्लोकाः (नीति संबंधी श्लोक)

इस पोस्‍ट में हमलोग बिहार बोर्ड संस्‍कृत कक्षा 10 पाठ सात नीतिश्लोकाः (Niti sloka class 10) के प्रत्‍येक पंक्ति के अर्थ के साथ उसके वस्‍तुनिष्‍ठ और विषयनिष्‍ठ प्रश्‍नों के व्‍याख्‍या को पढ़ेंगे।

7. नीतिश्लोकाः (नीति संबंधी श्लोक)

पाठ परिचय- इस पाठ (Niti Sloka) में व्यास रचित महाभारत के उद्योग पर्व के अन्तर्गत आठ अध्यायों की प्रसिद्ध विदुरनीति से संकलित दस श्लोक हैं। महाभारत युद्ध के आरम्भ में धृतराष्ट्र ने अपनी चित्तशान्ति के लिए विदुर से परामर्श किया था। विदुर ने उन्हें स्वार्थपरक नीति त्याग कर राजनीति के शाश्वत पारमार्थिक उपदेशक दिये थे। इन्हें ‘विदुरनीति‘ कहते हैं। इन श्लोकों में विदुर के अमूल्य उपदेश भरे हुए हैं।

(अयं पाठः सुप्रसिद्धस्य ग्रन्थस्य महाभारतस्य उद्योगपर्वणः अंशविशेष (अध्यायाः 33-40) रूपायाः विदुरनीतेः संकलितः। युद्धम् आसन्नं प्राप्य धृतराष्ट्रो मन्त्रिप्रवरं विदुरं स्वचित्तस्य शान्तये कांश्चित् प्रश्नान् नीतिविषयकान् पृच्छति। तेषां समुचितमुत्तरं विदुरो ददाति। तदेव प्रश्नोत्तररूपं ग्रन्थरत्नं विदुरनीतिः। इयमपि भगवद्गीतेव महाभारतस्यङ्गमपि स्वतन्त्रग्रन्थरूपा वर्तते।)
यह पाठ सुप्रसिद्ध ग्रन्थ महाभारत के उद्योगपर्व के अंश विशेष (अध्याय 33-40) रूप में विदुरनीति से संकलित है। युद्ध निकट पाकर धृतराष्ट्र ने मंत्री श्रेष्ठ विदुर को अपने चित की शन्ति के लिए कुछ प्रश्न पुछे। पूछे गये प्रश्नों का उत्तर विदुरनीति देते हैं। वहीं प्रश्नोत्तर रूप ग्रन्थरत्न विदुरनीति है। यह भी भगवद् गीता की तरह महाभारत का अंग स्वतंत्र ग्रन्थ रूप में है।

यस्य कृत्यं न विघ्नन्ति शीतमुष्णं भयं रतिः।
समृद्धिरसमृद्धिर्वा स वै पण्डित उच्यते।। 1।।

जिसके कर्म को शर्दी, गर्मी, भय, भावुकता, समपन्नता अथवा विपन्नता बाधा नहीं डालता है, उसे ही पंडित कहा गया है।

तत्वज्ञः सर्वभूतानां योगज्ञः सर्वकर्मणाम् ।
उपायज्ञो मनुष्याणां नरः पण्डित उच्यते ।। 2।।

सभी जीवों के आत्मा के रहस्य को जानने वाले, सभी कर्म के योग को जानने वाले और मनुष्यों में उपाय जानने वाले व्यक्ति को पंडित कहा जाता है।

अनाहूतः प्रविशति अपृष्टो बहुभाषते ।
अविश्वस्ते विश्वसिति मूढचेता नराधमः ।। 3।।

जो व्यक्ति बिना बुलाए किसी के यहाँ जाता है, बिना पूछे बोलता है और अविश्वासीयों पर विश्वास कर लेता है, उसे मुर्ख कहा गया है।

एको धर्मः परं श्रेयः क्षमैका शान्तिरुत्तमा।
विद्यैका परमा तृप्तिः अहिंसैका सुखावहा ।। 4।।

एक ही धर्म सबसे श्रेष्ठ है। क्षमा शांति का उतम उपाय है। विद्या से संतुष्टि प्राप्त होती है और अहिंसा से सुख प्राप्त होती है।

त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः ।
कामः क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत् त्रयं त्यजेत् ।। 5 ।।

नरक के तीन द्वार है- काम, क्रोध और लोभ। इसलिए इन तीनों को त्याग देना चाहिए।

षड् दोषाः पुरुषेणेह हातव्या भूतिमिच्छता ।
निद्रा तन्द्रा भयं क्रोध आलस्यं दीर्घसूत्रता ।। 6 ।।

एश्वर्य चाहने वाले व्यक्ति को निद्रा (अधिक सोना), तन्द्रा (उंघना), डर, क्रोध, आलस्य और किसी काम को देर तक करना । इन छः दोषों को त्याग देना चाहिए।

सत्येन रक्ष्यते धर्मो विद्या योगेन रक्ष्यते ।
मृजया रक्ष्यते रूपं कुलं वृत्तेन रक्ष्यते ।। 7।।

सत्य से धर्म की रक्षा होती है। अभ्यास से विद्या की रक्षा होती है। श्रृंगार से रूप की रक्षा होती है। अच्छे आचरण से कुल (परिवार) की रक्षा होती है।

सुलभाः पुरुषा राजन् सततं प्रियवादिनः ।
अप्रियस्य तु पथ्यस्य वक्ता श्रोता च दुर्लभः ।। 8।।

हे राजन! सदैव प्रिय बोलने वाले और सुनने वाले पुरूष आसानी से मिल जाते हैं, लेकिन अप्रिय ही सही उचित बोलने वाले कठिन है ।

पूजनीया महाभागाः पुण्याश्च गृहदीप्तयः ।
स्त्रियः श्रियो गृहस्योक्तास्तस्माद्रक्ष्या विशेषतः ।। 9।।

स्त्रियाँ घर की लक्ष्मी होती हैं। इन्ही से परिवार की प्रतिष्ठा बढ़ती है। यह महापुरूषों को जन्म देनेवाली होती है। इसलिए स्त्रियाँ विशेष रूप से रक्षा करने योग्य होती है।

अकीर्तिं विनयो हन्ति हन्त्यनर्थं पराक्रमः ।
हन्ति नित्यं क्षमा क्रोधमाचारो हन्त्यलक्षणम् ।। 10।।

विनम्रता बदनामी को दुर करती है, पौरूष या पराक्रम अनर्थ को दुर करता है, क्षमा क्रोध को दुर करता है और अच्छा आचरण बुरी आदतों को दुर करता है।

नीतिश्लोकाः (Objective Questions)
प्रश्‍न 1. परम तृप्ति देने वाली क्या है ?
(A) विद्या
(B) लोभ
(C) क्रोध
(D) दीर्घसूत्रता

उत्तर-(A) विद्या

प्रश्‍न 2. अपनी उन्नती चाहने वालों को कितने दोषों को त्याग देना चाहिए ?                                 
(A) सात
(B) छः
(C) पाँच
(D) आठ

उत्तर-(B) छः

प्रश्‍न 3. नीतिश्लोकाः पाठ किस ग्रंथ से संकलित है ?
(A) विदुरनीति से
(B) नीतिशतक से
(C) चाणक्यनीति दर्पण से
(D) शुक्र नीति से

उत्तर-(A) विदुरनीति से

प्रश्‍न 4. विदुरनीति‘ किस ग्रंथ का अंश विशेष है ?
(A) रामायण का
(B) महाभारत का
(C) उपनिषद् का
(D) वेद का

उत्तर-(B) महाभारत का

प्रश्‍न 5. धर्म की रक्षा किससे होती है ?
(A) सत्य से
(B) विद्या से
(C) वृक्ष से
(D) इनमें से कोई नहीं से

उत्तर-(A) सत्य से

प्रश्‍न 6. नर्क के द्वार कितने प्रकार के हैंजिनसे व्यक्ति का नाश होता है ?                                 
(A) चार प्रकार के
(B) पाँच प्रकार के
(C) तीन प्रकार के
(D) सात प्रकार के

उत्तर-(C) तीन प्रकार के

प्रश्‍न 7. विनय को कौन मारता है ?
(A) सुकीर्ति
(B) अपकृति
(C) अकीर्ति
(D) अनाकीर्ति

उत्तर-(C) अकीर्ति

प्रश्‍न 8. कैसे पुरूष सभी जगह सुलभ होते हैं ?
(A) सत्यवादी
(B) कटुवादी
(C) प्रियवादी
(D) यथार्थवादी

उत्तर-(C) प्रियवादी

प्रश्‍न 9. किसके प्रश्न उत्तर विदुर देते हैं ?
(A) दुशासन
(B) कृष्ण
(C) अर्जुन
(D) धृतराष्ट्र

उत्तर-(D) धृतराष्ट्र

लघु-उत्तरीय प्रश्नोजत्तर (20-30 शब्दोंत में) ____दो अंक स्तरीय
प्रश्‍न 1. नीतिश्लोकाः पाठ के आधार पर पण्डित के लक्षण बताएँ ?                                              (2018A)
उत्तर– जिसके कर्म को शर्दी, गर्मी, भय, भावुकता, समपन्नता अथवा विपन्नता बाधा नहीं डालता है, उसे ही पंडित कहा गया है तथा सभी जीवों के आत्मा के रहस्य को जानने वाले, सभी कार्यों को जानने वाला और मनुष्यों के उपाय को जानने वाले व्यक्ति को पंडित कहा जाता है।

प्रश्‍न 2. अपनी प्रगति चाहनेवाले को क्या करना चाहिए(2018A)
उत्तर-अपनी प्रगति चाहनेवाले को निद्रा, तंद्रा, भय, क्रोध, आलस और देर से काम करने की आदत को त्याग देना चाहिए ।

प्रश्‍न 3. नीतिश्लोकाः पाठ के आधार पर मुर्ख का लक्षण लिखें।                                                (2018C)
उत्तर– ‘नीतिश्लोकाः’ पाठ में महात्मा विदुर ने मूर्ख मनुष्य के तीन लक्षण बतलाए हैं। ऐसा व्यक्ति जो बिना बुलाए आता है तथा बिना पूछे ही अधिक बोलता है और अविश्वासी पर विश्वास करता है।

प्रश्‍न 4. नीतिश्लोकाः‘ पाठ में नरक के कितने द्वार हैंउसका नाम लिखें।
उत्तर– ‘नीतिश्लोका:’ पाठ के आधार पर नरक के तीन द्वार हैं – काम, क्रोध और लोभ।

प्रश्‍न 5. नरकस्य त्रिविधं द्वारं कस्य नाशनम् हिन्दी में उत्तर दें।(2014A)
उत्तर– नरक जाने के तीन रास्ते हैं- काम, क्रोध तथा लोभ। इनसे आत्मा नष्ट हो जाती है। इन तीनों को छोड़ देना चाहिए।

प्रश्‍न 6. नीतिश्लोकाः पाठ के अनुसार कौन-सा तीन वस्तु त्याग देना चाहिए (2013A)
उत्तर-नीतिश्लोक पाठ के अनुसार नरक के तीन द्वार काम, क्रोध और लोभ हैं। इसे त्याग देना चाहिए।

प्रश्‍न 7. नीच मनुष्य कौन हैपठित पाठ के आधार पर स्पष्ट करें।
उत्तर– जो बिना बुलाये हुए प्रवेश करता है, बिना पूछे हुए बहुत बोलता है, अविश्वा्सी पर विश्वास करता है ऐसा पुरुष ही नीच श्रेणी में आता है।

प्रश्‍न 8. नीतिश्लोकाः‘ पाठ के आधार पर स्त्रियों की क्या विशेषताएँ हैं?
उत्तर– स्त्रियाँ घर की लक्ष्मी हैं। ये पूजनीय तथा महाभाग्यशाली हैं। ये महापुरूषों को जन्म  देनेवाली होती है। इसलिए स्त्रियाँ विशेष रूप से रक्षा करने योग्य होती हैं ।

प्रश्‍न 9. नीतिश्लोकाः के आधार पर कैसा बोलने वाले व्यक्ति कठिन से मिलते हैं?
उत्तर– नीतिश्लोकाः पाठ में कहा गया है कि सत्य (कल्याणकारी) लेकिन अप्रिय बातों को कहनेवाले और सुननेवाले व्यक्ति इस संसार में बड़ी कठिनाई से मिलते हैं।

प्रश्‍न 10. नीतिश्लोकाः‘ पाठ के आधार पर नराधम के लक्षण लिखें ।(2012C)
उत्तर– बिना बुलाए हुए प्रवेश करता है, बिना पूछे हुए बहुत बोलता है, अविश्वसनीय व्यक्ति पर विश्वास करता है। ये नराधम के लक्षण हैं। अर्थात् मनुष्यों में नीच होते हैं।

प्रश्‍न 11. नीतिश्लोकाः‘ पाठ के आधार पर सुलभ और दुर्लभ कौन है ?
उत्तर– सदा प्रिय बोलनेवाले, अर्थात जो अच्छा लगे वही बोलनेवाले मनुष्य सुलभ हैं। अप्रिय ही सही उचित वचन बोलने वाले तथा सुननेवाले मनुष्य दोनों ही प्रायःदुर्लभ हैं।

प्रश्‍न 12. नीतिश्लोकाः‘ पाठ में मुढचेता नराधम किसे कहा गया है(2011A, 2014A)
उत्तर-जिन व्यक्तियों का स्वाभिमान मरा हुआ होता है, जो बिना बुलाए किसी के यहाँ जाता है, बिना कुछ पूछे बक-बक करता है। जो अविश्वसनीय पर विश्वास करता है ऐसा मूर्खहृदयवाला मनुष्यों में नीच होता है। अर्थात् ऐसे ही व्यक्ति को ‘नीतिश्लोकाः’ पाठ में मूढचेता नराधम कहा गया है।

प्रश्‍न 13. नीतिश्लोकाः‘ पाठ से हमें क्या संदेश मिलता है?
उत्तर– ‘नीतिश्लोकाः’ पाठ महात्माविदुर-रचित ‘विदुर-नीति’ से उद्धृत है। इसमें महाभारत से लिया गया चित्त को शांत करनेवाला आध्यात्मिक श्लोक हैं। इन श्लोकों में जीवन के यथार्थ पक्ष का वर्णन किया गया है। इससे संदेश मिलता है कि सत्य ही सर्वश्रेष्ठ है। सत्य मार्ग से कभी विचलित नहीं होना चाहिए ।

प्रश्‍न 14. नीतिश्लोकाः पाठ के आधार पर मनुष्य के षड् दोषों का हिन्दी में वर्णन करें।
अथवाअपना विकास चाहने वाले को किन-किन दोषों को त्याग देना चाहिए?
अथवाछ: प्रकार के दोष कौन हैंपठित पाठ के आधार पर वर्णन करें। (2016A, 2012A, 2014C)
उत्तर-मनुष्य के छ: प्रकार के दोष निद्रा, तन्द्रा, भय, क्रोध, आलस्य तथा दीर्घसूत्रता ऐश्वर्य (विकास) प्राप्ति में बाधक बननेवाले होते हैं। जो पुरुष ऐश्वर्य चाहते हैं। उन्हें इन दोषों को त्याग देना चाहिए।

प्रश्‍न 15. नीतिश्लोकाः‘ पाठ से हमें क्या शिक्षा मिलती है?
उत्तर-विदुर-नीति से नीतिश्लोकाः पाठ उद्धृत है। इसमें महात्मा विदुर ने मन को शांत करने के लिए कुछ श्लोक लिखे हैं। इन श्लोकों से हमें यह शिक्षा मिलती है कि सांसारिक सुख थोड़ी देर के लिए है, लेकिन आध्यात्मिक सुख स्थायी है। सुंदर आचरण से हम बुरे आचरण को समाप्त कर सकते हैं। काम, क्रोध, लोभ और मोह को नष्ट करके नरक जाने से बच सकते हैं।

प्रश्‍न 16.नीतिश्लोकाः पाठ का पाँच वाक्यों में परिचय दें।
उत्तर– इस पाठ में व्यासरचित महाभारत के उद्योग पर्व के अंतर्गत विदुरनीति से संकलित दस श्लोक हैं। महाभारत युद्ध के आरंभ में धृतराष्ट्र ने अपनी चित्त  शान्ति के लिए विदुर से परामर्श किया था। विदुर ने उन्हें स्वार्थपरक नीति त्याग कर राजनीति के शाश्वत (जो कभी न बदले) पारमार्थिक (जो हमेशा एकरूप और एकरस रहे) उपदेश दिये थे। इन्हें ‘विदुरनीति’ कहते हैं। इन श्लोकों में विदुर के अमूल्य उपदेश भरे हुए हैं।

10th class sanskrit shlok

Class 10 Sanskrit Chapter 4 सूक्ति – सुधा (पद्य – पीयूषम्)

पाठ-सारांश

प्रस्तुत पाठ में नौ सूक्तियाँ संकलित हैं। उनका संक्षिप्त सार इस प्रकार है

  1. संसार की समस्त भाषाओं में देववाणी कही जाने वाली भाषा संस्कृत सर्वश्रेष्ठ है। इसका काव्य सुन्दर है। और इसके सुन्दर एवं मधुर वचन (सूक्तियाँ) तो अद्वितीय हैं।
  2. मूर्ख लोग पत्थर के टुकड़ों को रत्न मानते हैं, जब कि इस पृथ्वी पर रत्न तो अन्न, जल एवं मधुरं वचन हैं।
  3. बुद्धिमान् लोग अपना समय ज्ञानार्जन में लगाते हैं, जब कि मूर्ख लोग अपने समय को सोने अथवा निन्दित कार्यों में व्यर्थ गॅवाते हैं।
  4. जहाँ सज्जन निवास करते हैं, वहाँ संस्कृत के मधुर श्लोक सर्वत्र आनन्द का प्रसार करते हैं। इसके विपरीत जहाँ दुर्जन निवास करते हैं, वहाँ ‘श्लोक’ के ‘ल’ का लोप होकर केवल ‘शोक’ ही शेष रह जाता है, अर्थात् वहाँ पर आनन्द का अभाव हो जाता है।
  5. व्यक्ति को सदैव समयानुसार ही बात करनी चाहिए। समय के विपरीत बात करने पर तो बृहस्पति भी उपहास के पात्र बने थे।
  6. श्रद्धा के साथ कही गयी तथा पूछी गयी बात सर्वत्र आदरणीय होती है और बिना श्रद्धा के वह वन में रोने के समान व्यर्थ होती है।
  7. विद्या सर्वश्रेष्ठ धन है; क्योंकि यह राजा द्वारा छीनी नहीं जा सकती, भाइयों द्वारा विभाजित नहीं की जा सकती। इसीलिए देवताओं और विद्वानों द्वारा इसकी उपासना की जाती है।
  8. याचकों के दु:खों को दूर न करने वाली लक्ष्मी, विष्णु की भक्ति में मन को न लगाने  वाली विद्या, विद्वानों में प्रतिष्ठा प्राप्त न करने वाला पुत्र, ये तीनों न होने के बराबर ही हैं।
  9. व्यक्ति की शोभा स्नान, सुगन्ध-लेपन एवं आभूषणों से नहीं होती है, वरन् उसकी शोभा तो एकमात्र सुन्दर मधुर वाणी से ही होती है।

 

पद्यांशों की ससन्दर्भ हिन्दी व्याख्या

(1)
भाषासु मुख्या मधुरा दिव्या गीर्वाणभारती।
तस्माद्धि काव्यं मधुरं तस्मादपि सुभाषितम् ॥ [2009, 10, 12, 13]

शब्दार्थ भाषासु = भाषाओं में मुख्या = प्रमुख। मधुरा = मधुर गुणों से युक्त। दिव्या = अलौकिक गीर्वाणभारती = देवताओं की वाणी, संस्कृत। तस्मात् = उससे। हि = निश्चयपूर्वका अपि = भी। सुभाषितम् = सुन्दर या उपदेशपरक वचन। सन्दर्भ प्रस्तुत श्लोक हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘संस्कृत’ के पद्य-खण्ड ‘पद्य-पीयूषम्’ में संकलित ‘सूक्ति-सुधा’ शीर्षक पाठ से अवतरित है।

[ संकेत इस पाठ के शेष सभी श्लोकों के लिए यही सन्दर्भ प्रयुक्त होगा। ]

प्रसंग प्रस्तुत श्लोक में संस्कृत भाषा और सुभाषित की विशेषता बतायी गयी है।

अन्वय भाषासु गीर्वाणभारती मुख्या, मधुरा दिव्या (च अस्ति)। तस्मात् हि काव्यं मधुरम् (अस्ति), तस्मात् अपि सुभाषितम् (मधुरम् अस्ति)।।

व्याख्या विश्व की समस्त भाषाओं में देवताओं की वाणी अर्थात् संस्कृत प्रमुख, मधुर गुण से युक्त और अलौकिक है। इसलिए उसका काव्य भी मधुर है। उससे भी मधुर उसके सुन्दर उपदेशपरक वचन अर्थात् सुभाषित हैं। तात्पर्य यह है कि संस्कृतभाषा सर्वविध गुणों से युक्त है।

(2)
पृथिव्यां त्रीणि रत्नानि जलमन्नं सुभाषितम्।
मूढः पाषाण-खण्डेषु रत्न-संज्ञा विधीयते ॥ [2006,07,08,09, 10,12]

शब्दार्थ पृथिव्यां = भूतल पर, पृथ्वी पर त्रीणि रत्नानि = तीन रत्न। सुभाषितम् =अच्छी वाणी। मूढः = मूर्ख लोगों के द्वारा पाषाणखण्डेषु = पत्थर के टुकड़ों में। रत्नसंज्ञा = रत्न का नाम विधीयते = किया जाता है।

प्रसग प्रस्तुत श्लोक में जल, अन्न और सुन्दर वचन को ही वास्तविक रत्न बताया गया है।

अन्वय पृथिव्यां जलम्, अन्नं, सुभाषितम् (इति) त्रीणि रत्नानि (सन्ति)। मूढ: पाषाणखण्डेषु रत्नसंज्ञा विधीयते।

व्याख्या पृथ्वी पर जल, अन्न और सुन्दर (उपदेशपरक) वचन–ये तीन रत्न अर्थात् श्रेष्ठ पदार्थ हैं। मूर्ख लोगों ने पत्थर के टुकड़ों को रत्न का नाम दे दिया है। तात्पर्य यह है कि जल, अन्न और मधुर वचनों का प्रभाव समस्त संसार के कल्याण के लिए होता है, जब कि रल जिनके पास होते हैं, केवल उन्हीं का कल्याण करते हैं। अत: जल, अन्न और मधुर वचन ही वास्तविक रत्न हैं।

(3) काव्यशास्त्रविनोदेन कालो गच्छति धीमताम्। व्यँसनेन च मूर्खाणां निद्रया कलहेन वा॥ [2007,08, 10]

शब्दार्थ काव्यशास्त्रविनोदेन = काव्य और शास्त्रों के अध्ययन द्वारा मनोरंजन से। कालः = समय। गच्छति = बीतता है। धीमताम् = बुद्धिमानों का। व्यसनेन = निन्दनीय कर्मों के करने से। निद्रया = निद्रा द्वारा कलहेन = झगड़ा करने से। वा = अथवा।।

प्रसंग प्रस्तुत श्लोक में मूर्खा और बुद्धिमानों के समय बिताने के साधन में अन्तर बताया गया है।

अन्वय धीमतां कालः काव्यशास्त्रविनोदेन गच्छति, मूर्खाणां (कालः) च व्यसनेन, निद्रया कलहेन वा (गच्छति)।

व्याख्या बुद्धिमानों का समय काव्य और शास्त्रों के अध्ययन द्वारा मनोरंजन (आनन्द प्राप्त करने) और पठन-पाठन में व्यतीत होता है। मूर्खा का समय निन्दित कार्यों के करने में, सोने में अथवा झगड़ने में व्यतीत होता है।

(4)
श्लोकस्तु श्लोकतां याति यत्र तिष्ठन्ति साधवः।
लकारो लुप्यते यत्र तत्र तिष्ठन्त्यसाधवः ॥ [2006,08,09, 10]

शब्दार्थ श्लोकस्तु = यश तो। लोकताम् याति = कीर्ति की प्राप्ति करता है। यत्र = जहाँ। तिष्ठन्ति = रहते हैं। साधवः = सज्जन पुरुष लकारो लुप्यते = श्लोक का ‘ल’ वर्ण लुप्त हो जाता है अर्थात् श्लोक ‘शोक’ बन जाता है। तत्र = वहाँ। असाधवः = दुर्जन पुरुष।

प्रसंग प्रस्तुत श्लोक में सज्जनों और दुर्जनों की संगति का प्रभाव दर्शाया गया है।

अन्वय यत्र साधवः तिष्ठन्ति, श्लोकः तु श्लोकताम् याति। यत्र असाधवः तिष्ठन्ति, तत्र लकारो लुप्यते (अर्थात् श्लोकः शोकतां याति)।

व्याख्या जहाँ सज्जन रहते हैं, वहाँ श्लोक (संस्कृत का छन्द) कीर्ति की प्राप्ति करता है। जहाँ दुर्जन रहते हैं, वहाँ श्लोक का ‘लु’ लुप्त हो जाता है अर्थात् श्लोक ‘शोक’ की प्राप्ति कराता है। तात्पर्य यह है कि अच्छी बातों, उपदेशों या सूक्तियों का प्रभाव सज्जनों पर ही पड़ता है; दुष्टों पर तो उसका विपरीत प्रभाव पड़ता है। यह भी कहा जा सकता है कि सज्जनों की उपस्थिति वातावरण को आनन्दयुक्त कर देती है और दुर्जनों की उपस्थिति दुःखपूर्ण बना देती है।

 

(5)
अप्राप्तकालं वचनं बृहस्पतिरपि ब्रुवन्।
प्राप्नुयाद् बुद्ध्यवज्ञानमपमानञ्च-शाश्वतम् ॥ [2011]

शब्दार्थ अप्राप्तकालम् = समय के प्रतिकूल वचन = बात। बृहस्पतिः = देवताओं के गुरु बृहस्पति अर्थात् अत्यधिक ज्ञानवान् व्यक्ति। अपि = भी। बुवन् = बोलता हुआ। प्राप्नुयात् = प्राप्त करता है। बुद्ध्यवज्ञानम् = बुद्धि की उपेक्षा; बुद्धि की अवमानना। शाश्वतम् = निरन्तर।।

प्रसंग प्रस्तुत श्लोक में समय के प्रतिकूल बात न कहने की शिक्षा दी गयी है।

अन्वय अप्राप्तकालं वचनं ब्रुवन् बृहस्पतिः अपि बुद्ध्यवज्ञानं शाश्वतम् अपमानं च प्राप्नुयात्।

व्याख्या समय के विपरीत बात को कहते हुए देवताओं के गुरु बृहस्पति भी बुद्धि की अवज्ञा और सदा रहने वाले अपमान को प्राप्त करते हैं। तात्पर्य यह है कि प्रत्येक व्यक्ति को समय के अनुकूल बात ही करनी चाहिए।

(6)
वाच्यं श्रद्धासमेतस्य पृच्छतश्च विशेषतः
प्रोक्तं श्रद्धाविहीनस्याप्यरण्यरुदितोपमम् ॥

शब्दार्थ वाच्यम् = कहने योग्य। श्रद्धासमेतस्य = श्रद्धा से युक्त का। पृच्छतः =  पूछने वाले का। प्रोक्तं = कहा हुआ। श्रद्धाविहीनस्य = श्रद्धारहित के लिए। अरण्य-रुदितोपमम् = अरण्यरोदन के समान निरर्थक है।

प्रसंग प्रस्तुत श्लोक में श्रद्धा के महत्त्व का प्रतिपादन किया गया है।

अन्वये श्रद्धासमेतस्य विशेषतः पृच्छतः च वाच्यम्। श्रद्धाविहीनस्य प्रोक्तम् अपि अरण्यरुदितोपमम् (अस्ति )।

व्याख्या श्रद्धा से युक्त अर्थात् श्रद्धालु व्यक्ति की और विशेष रूप से पूछने वाले की बात कहने योग्य होती है। श्रद्धा से रहित अर्थात् अश्रद्धालु व्यक्ति का कहा हुआ भी अरण्यरोदन अर्थात् जंगल में रोने के समान निरर्थक है। तात्पर्य यह है कि ऐसे ही व्यक्ति या शिष्य को ज्ञान देना चाहिए, जो श्रद्धालु होने के साथ-साथ जिज्ञासु भी हो।

 

(7)
वसुमतीपतिना नु सरस्वती, बलवता रिपुणा न च नीयते
समविभागहरैर्न विभज्यते, विबुधबोधबुधैरपि सेव्यते ॥ [2006, 10]

शब्दार्थ वसुमतीपतिना = राजा के द्वारा| सरस्वती = विद्या| बलवता रिपुणी = बलवान् शत्रु के द्वारा न नीयते = नहीं ले जायी जाती है। समविभागहरैः = समान हिस्सा लेने वाले भाई-बहनों के द्वारा। न विभज्यते = नहीं विभक्त की जाती है। विबुधबोधबुधैः = ऊँचे से ऊँचे विद्वानों के द्वारा। सेव्यते = सेवित होती है।

प्रसंग प्रस्तुत श्लोक में विद्या को अमूल्य धन बताया गया है।

अन्वय सरस्वती वसुमतीपतिना बलवता रिपुणा च न नीयते। समविभागहरैः न विभज्यते, विबुधबोधबुधैः अपि सेव्यते।।

व्याख्या विद्या राजा के द्वारा और बलवान् शत्रु के द्वारा (हरण करके) नहीं ले जायी जाती है। यह समान हिस्सा लेने वाले भाइयों के द्वारा भी बाँटी नहीं जाती है तथा देवताओं के ज्ञान के समान ज्ञान वाले विद्वानों के द्वारा भी सेवित होती है। तात्पर्य यह है कि विद्या को न तो राजा ले सकता है और न ही बलवान् शत्रु। इसे भाई-बन्धु भी नहीं बाँटते अपितु यह तो ज्ञानी-विद्वानों द्वारा भी सेवित है।

(8)
लक्ष्मीनं या याचकदुः खहारिणी, विद्या नयाऽप्यच्युतभक्तिकारिणी।
पुत्रो न यः पण्डितमण्डलाग्रणीः, सा नैव सा नैव स नैव नैव ॥ [2012]

शब्दार्थ या = जो लक्ष्मी। याचकदुःखहारिणी = याचकों के दुःख को दूर करने वाली। अच्युतभक्तिकारिणी = विष्णु की भक्ति उत्पन्न करने वाली। पण्डितमण्डलाग्रणीः = पण्डितों के समूह में आगे रहने वाला, श्रेष्ठ। सानैव = वह नहीं है।

प्रसंग प्रस्तुत सूक्ति में वास्तविक लक्ष्मी, विद्या तथा पुत्र के विषय में बताया गया है।

अन्वय या लक्ष्मीः याचकदु:खहारिणी न (अस्ति) सा (लक्ष्मीः) नैव (अस्ति)। या विद्या अपि अच्युतभक्तिकारिणी न (अस्ति) सा (विद्या) नैव (अस्ति)। यः पुत्रः पण्डितमण्डलाग्रणी: न (अस्ति) सः (पुत्र) एव न (अस्ति), नैव (अस्ति)।

व्याख्या जो लक्ष्मी याचकों अर्थात् माँगने वालों के दु:खों को दूर करने वाली नहीं है, वह लक्ष्मी ही नहीं है, जो विद्या भी भगवान् विष्णु में भक्ति उत्पन्न करने वाली नहीं है, वह विद्या ही नहीं है, जो पुत्र पण्डितों के समूह में आगे रहने वाला (श्रेष्ठ) नहीं है; वह पुत्र ही नहीं है। तात्पर्य यह है कि वास्तविक धन वही है, जो परोपकार में प्रयुक्त होता है; विद्या वही है, जिससे आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त होता है और पुत्र वही है जो विद्वान् होता है।

 

(9)
केयूराः न विभूषयन्ति पुरुषं हारा न चन्द्रोज्ज्वलाः।
न स्नानं न विलेपनं न कुसुमं नालङ्कृता मूर्द्धजाः ॥ [2012]
वाण्येका समलङ्करोति पुरुषं या संस्कृता धार्यते
क्षीयन्ते खलु भूषणानि सततं वाग्भूषणं भूषणम् ॥ [2009]

शब्दार्थ केयूराः = बाजूबन्द (भुजाओं में पहना जाने वाला सोने का आभूषण)। हाराः = हार। विभूषयन्ति = सजाते हैं। चन्द्रोज्ज्वलाः = चन्द्रमा के समान उज्ज्वला विलेपनम् = शरीर में किया जाने वाला चन्दन आदि का लेप। कुसुमं = फूल। अलङ्कृताः = सजे हुए। मूर्द्धजाः = बाल। वाण्येका (वाणि + एका) = एकमात्र वाणी। समलङ्करोति = सजाती है। संस्कृती = संस्कार की गयी, भली-भाँति अध्ययन आदि के द्वारा शुद्ध की गयी। धार्यते = धारण की जाती है। क्षीयन्ते = नष्ट हो जाते हैं। खलु = निश्चित ही। भूषणानि = समस्त आभूषण। सततं = सदा| वाग्भूषणम् = वाणीरूपी आभूषण। भूषणं = आभूषण।।

प्रसंग प्रस्तुत श्लोक में संस्कारयुक्त वाणी का महत्त्व बताया गया है।

अन्वय केयूराः पुरुषं न विभूषयन्ति, चन्द्रोज्ज्वला: हाराः न (विभूषयन्ति)। न स्नानं, न विलेपनं, न कुसुमं, न अलङ्कृताः मूर्द्धजाः पुरुषं (विभूषयन्ति)। एकावाणी, या संस्कृता धार्यते, पुरुषं समलङ्करोति। भूषणानि खलु क्षीयन्ते। वाग्भूषणं (वास्तविकं) सततं भूषणम् (अस्ति)।

व्याख्या पुरुष को सुवर्ण के बने बाजूबन्द सुशोभित नहीं करते हैं। चन्द्रमा के समान उज्ज्वल हार शोभित नहीं करते हैं। स्नान, चन्दनादि का लेप, फूल, सुसज्जित बाल पुरुष को शोभित नहीं करते हैं। एकमात्र वाणी, जो अध्ययनादि द्वारा संस्कार करके धारण की गयी है, पुरुष को सुशोभित करती है। अन्य आभूषण तो निश्चित ही नष्ट हो जाते हैं। वाणीरूपी आभूषण ही सदा आभूषण है। तात्पर्य यह है कि वाणी-रूपी आभूषण ही सच्चा आभूषण है, जो कभी नष्ट नहीं होता।

 

सूक्तिपरक वाक्यांशों की व्याख्या

(1) भाषासु मुख्या मधुरा दिव्या गीर्वाणभारती। [2011]

सन्दर्भ प्रस्तुत सूक्तिपरक पंक्ति हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘संस्कृत’ के पद्य-खण्ड ‘पद्य-पीयूषम्’ के . ‘सूक्ति-सुधा’ नामक पाठ से उद्धृत है।

[ संकेत इस पाठ की शेष सभी सूक्तियों के लिए यही सन्दर्भ प्रयुक्त होगा।]

प्रसंग इस सूक्ति में संस्कृत भाषा के महत्त्व को बताया गया है।

अर्थ सभी भाषाओं में संस्कृत सबसे प्रमुख, मधुर और अलौकिक है।

व्याख्या विश्व की समस्त भाषाओं में संस्कृत भाषा को ‘गीर्वाणवाणी’ अर्थात् देवताओं की भाषा बताया गया है। यह भाषा शब्द-रचना की दृष्टि से दिव्य, भाषाओं की दृष्टि से मधुर तथा विश्व की भाषाओं में प्रमुख है। इस भाषा में उत्तम काव्य, सरस नाटक और चम्पू पाये जाते हैं। इस भाषा में धर्म, दर्शन, इतिहास, चिकित्सा आदि सभी विषयों पर प्रचुर सामग्री उपलब्ध है। इतनी सम्पूर्ण भाषा विश्व में कोई और नहीं है।

(2) भाषासु काव्यं मधुरं तस्मादपि सुभाषितम्। [2005]

प्रसंग प्रस्तुत सूक्ति में सुभाषित के महत्त्व को बताया गया है।

अर्थ (संस्कृत) भाषा में काव्य मधुर है तथा उससे भी अधिक सुभाषित।

व्याख्या भाषाओं में संस्कृत भाषा सबसे दिव्य, मुख्य और मधुर है। इससे भी अधिक मधुर इस भाषा के काव्य हैं और काव्यों से भी अधिक मधुर हैं इस भाषा के सुभाषित। सुभाषित से आशय ऐसी उक्ति या कथन से होता है जो बहुत ही अच्छी हो। इसे सूक्ति भी कहते हैं। सूक्तियाँ प्रत्येक देश और प्रत्येक काल में प्रत्येक मनुष्य के लिए समान रूप से उपयोगी होती हैं। जिस प्रकार सुन्दर वचन बोलने से वक्ता और श्रोता दोनों का ही हित होता है, उसी प्रकार काव्यों में निहित सूक्तियाँ आनन्ददायिनी होने के साथ-साथ जीवन में नैतिकता का समावेश कराती हैं तथा अमृत-तत्त्व की प्राप्ति में प्रेरणा प्रदान करती हैं। यही कारण है कि (संस्कृत) भाषा में सूक्ति को सर्वोपरि मान्यता प्रदान की गयी है।

(3)
पृथिव्यां त्रीणि रत्नानि, जलमन्नं सुभाषितम्। [2006,07, 08, 11, 12, 14]
मूढः पाषाणखण्डेषु, रत्नसंज्ञाविधीयते ॥ [2007,08, 11, 15]

प्रसंग इन सूक्तियों में जल, अन्न और अच्छे वचनों को ही सर्वोत्कृष्ट रत्न की संज्ञा प्रदान की गयी है।

अर्थ पृथ्वी पर जल, अन्न और सुभाषित ये तीन रत्न हैं। मूर्ख व्यक्ति ही पत्थरों को रत्न मानते हैं।

व्याख्या मानव ही नहीं पशु-पक्षी भी अन्न-जल और सुन्दरवाणी के महत्त्व को भली प्रकार पहचानते हैं। अन्न से भूख शान्त होती है, जल से प्यास बुझती है और सुन्दर वचनों से मन को सन्तोष मिलता है। बिना अन्न और जल के तो जीवधारियों का जीवित रहना कठिन ही नहीं वरन् असम्भव ही है। इसीलिए इन्हें सच्चे रत्न कहा गया है। सांसारिक मनुष्य अपनी अल्पज्ञता के कारण सभी प्रकार से धन-संग्रह की प्रवृत्ति में लगा रहता है। वह हीरे, रत्न, जवाहरात, मणियों का संचय करके धनी एवं वैभवशाली बनना चाहता है। वह इन्हें ही अमूल्य एवं महत्त्वपूर्ण मानता है, परन्तु वास्तविकता कुछ और ही है। ये तो पत्थर के टुकड़े मात्र हैं। वास्तव में जल, अन्न और सुवाणी (अच्छे वचन) ही सच्चे रत्न हैं।

(4) काव्यशास्त्रविनोदेन कालो गच्छति धीमताम्। [2006,07,08, 09, 10, 11, 14, 15]

प्रसंग प्रस्तुत सूक्ति में सज्जनों के समय व्यतीत करने के विषय में बताया गया है।

अर्थ बुद्धिमानों का समय काव्य-शास्त्र के पठन-पाठन में ही बीत जाता है।

 

व्याख्या विद्वान् और सज्जन अपने समय को शास्त्रों और काव्यों का अध्ययन करने में लगाते हैं। वे यदि अपना मनोरंजन भी करते हैं तो इसी प्रकार के अच्छे कार्यों से करते हैं और सदैव लोकोपकार की बात सोचते हैं, क्योंकि वे समय के महत्त्व को जानते हैं। वे समझते हैं कि “आयुषः क्षण एकोऽपि न लभ्यः स्वर्णकोटिकैः । सचेन्निरर्थकं नीतः का नु हानिस्ततोऽधिकाः ।।”; अर्थात् आयुष्य का एक भी क्षण सोने की करोड़ों मुद्राओं के द्वारा नहीं खरीदा जा सकता। यदि इसे व्यर्थ बिता दिया गया तो इससे बड़ी हानि और क्या हो सकती है? इसीलिए वे अपना समय काव्य-शास्त्रों के अध्ययन में व्यतीत करते हैं क्योंकि आत्म-उद्धार के लिए भी ज्ञान परम आवश्यक है।

(5) व्यसनेन च मूर्खाणां निद्रयाकलहेन वा। [2010]

प्रसंग प्रस्तुत सूक्ति में मूर्ख लोगों के समय व्यतीत करने के विषय में बताया गया है।

अर्थ मूख का समय बुरी आदतों, निद्रा व झगड़ने में व्यतीत होता है।

व्याख्या मूर्ख लोग अपना समय सदैव ही व्यर्थ के कार्यों में बिताते हैं। समय बिताने के लिए वे जुआ, शराब आदि के व्यसन करते हैं और स्वयं को नरक में धकेलते हैं। कुछ लोग अपना समय सोकर बिता देते हैं। और कुछ लड़ाई-झगड़े में अपना समय लगाकर दूसरों को पीड़ा पहुँचाते हैं। इनके किसी भी कार्य से किसी को कोई लाभ अथवा सुख नहीं मिलता है; क्योंकि परोपकार करना इनको आता ही नहीं है। इन्हें तो दूसरों को पीड़ा पहुँचाने में ही सुख की प्राप्ति होती है।

(6), श्लोकस्तु श्लोकतां याति यत्र तिष्ठन्ति साधवः। [2012]

प्रसंग प्रस्तुत सूक्ति में सज्जनों की उपस्थिति का महत्त्व समझाया गया है।

अर्थ जहाँ सज्जन निवास करते हैं, वहाँ श्लोक तो यश को प्राप्त करता है।

व्याख्या सज्जन अच्छी और सुन्दर बातों को बढ़ावा देकर उनके संवर्द्धन में अपना योगदान देते हैं। इसीलिए सज्जनों के मध्य विकसित श्लोक; अर्थात् संस्कृत कविता का छन्द; कवि की कीर्ति या यश को चतुर्दिक फैलाता है। आशय यह है कि कविता सज्जनों के मध्य ही आनन्ददायक होती है तथा कवि को यश व कीर्ति प्रदान करती है। दुर्जनों के मध्य तो यह विवाद उत्पन्न कराती है तथा शोक (दुःख) का कारण बनती है।

(2) वसुमतीपतिना नु सरस्वती।। [2011]

प्रसंग प्रस्तुत सूक्ति में विद्या के विषय में वर्णन किया गया है।

अर्थ राजा के द्वारा भी विद्या (नहीं छीनी जा सकती है)।

व्याख्या विद्या न तो राजा के द्वारा अथवा न ही किसी बलवान् शत्रु के द्वारा बलपूर्वक छीनी जी सकती है। यह विद्यारूपी धन किसी के द्वारा बाँटा भी नहीं जा सकता, अपितु यह तो जितनी भी बाँटी जाए, उसमें उतनी ही वृद्धि होती है। यह धन तो बाँटे जाने पर बढ़ता ही रहता है। प्रस्तुत सूक्ति विद्या की महत्ता को परिभाषित करती है।

(8) लक्ष्मीनं या याचकदुःखहारिणी। [2012]

प्रसंग प्रस्तुत सूक्ति में लक्ष्मी की सार्थकता पर प्रकाश डाला गया है।

अर्थ जो याचक (माँगने वालों) के दु:खों को दूर करने वाली नहीं है, (वह) लक्ष्मी (नहीं है)।

 

व्याख्या किसी भी व्यक्ति के पास लक्ष्मी अर्थात् धन है तो उस लक्ष्मी की सार्थकता इसी में है कि वह उसके द्वारा याचकों अर्थात् माँगने वालों के दु:खों को दूर करे। आशय यह है कि धनसम्पन्न होने पर भी कोई व्यक्ति यदि किसी की सहायता करके उसके कष्टों को दूर नहीं करता है तो उसका धनसम्पन्न होना व्यर्थ ही है। व्यक्ति का धनी होना तभी सार्थक है जब वह याचक बनकर अपने पास आये लोगों को निराश न करके अपनी सामर्थ्य के अनुसार उनकी सहायता करे। कविवर रहीम ने सामर्थ्यवान् लेकिन याचक की मदद न करने वाले लोगों को मृतक के समान बताया है रहिमन वे नर मर चुके, जे कहुँ माँगन जाय। उनते पहले वे मुए, जिन मुख निकसत नाय ॥

(9) विद्या न याऽप्यच्युतभक्तिकारिणी।। [2008, 1]

प्रसंग प्रस्तुत सूक्ति में विद्या की सार्थकता पर प्रकाश डाला गया है।

अर्थ जो विद्या भगवान विष्णु की भक्ति में प्रवृत्त करने वाली नहीं है, (वह विद्या नहीं है)।

व्याख्या वही विद्या सार्थक है, जो व्यक्ति को भगवान विष्णु अर्थात् ईश्वर की भक्ति में प्रवृत्त करती है। जो विद्या व्यक्ति को ईश्वर की भक्ति से विरत करती है, वह किसी भी प्रकार से विद्या कहलाने की अधिकारिणी ही नहीं है। विद्या वही है, जो व्यक्ति को जीवन और मरण के बन्धन से मुक्त करके मोक्ष-पद प्रदान करे। मोक्ष-पद को भक्ति के द्वारा ही प्राप्त किया जा सकता है। व्यक्ति को भक्ति में विद्या ही अनुरक्त कर सकती है। इसीलिए विद्या को प्रदान करने वाले गुरु को कबीरदास जी ने ईश्वर से भी श्रेष्ठ बताया है गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागूं पाँय।। बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो बताय॥

(10) पुत्रो न यः पण्डितमण्डलाग्रणीः। [2006,09]

प्रसंग प्रस्तुत सूक्ति में सच्चे पुत्र की विशेषता बतायी गयी है।

अर्थ जो पुत्र विद्वानों की मण्डली में अग्रणी नहीं, वह पुत्र ही नहीं है।

व्याख्या सूक्तिकार का तात्पर्य यह है प्रत्येक व्यक्ति पुत्र की कामना इसीलिए करता है कि वह उसके कुल के नाम को चलाएगा; अर्थात् अपने सद्कर्मों से अपने कुल के यश में वृद्धि करेगा और यह कार्य महान् पुत्र ही कर सकता है। मूर्ख पुत्र के होने का कोई लाभ नहीं होता; क्योंकि उससे कुल के यश में वृद्धि नहीं होती। ऐसा पुत्र होने से तो नि:सन्तान रह जाना ही श्रेयस्कर है। वस्तुतः पुत्र कहलाने का अधिकारी वही है, जो विद्वानों की सभा में अपनी विद्वत्ता का लोहा मनवाकर अपने माता-पिता तथा कुल के सम्मान को बढ़ाता है।

(11) वाण्येको समलङ्करोति पुरुषं या संस्कृता धार्यते [2006, 11]

प्रसंग प्रस्तुत सूक्ति में वाणी को ही वास्तविक आभूषण कहा गया है।

अर्थ मात्र वाणी ही, जो शुद्ध रूप से धारण की जाती है, मनुष्य को सुशोभित करती है।

व्याख्या संसार का प्रत्येक प्राणी सांसारिक प्रवृत्तियों में उलझा रहता है और उन्हीं प्रवृत्तियों में वह (भौतिक) सुख का अनुभव करता है। इसीलिए वह अपने आपको सजाकर रखना चाहता है और दूसरों के समक्ष स्वयं को आकर्षक सिद्ध करना चाहता है, अर्थात् आत्मा की अपेक्षा वह शरीर को अधिक महत्त्व देता है। वह विभिन्न आभूषणों को धारण करता है, परन्तु ऐसे आभूषण तो समय बीतने के साथ-साथ नष्ट हो जाते हैं। सच्चा आभूषण तो मधुर वाणी है, जो कभी भी नष्ट नहीं होती। मधुर वाणी मनुष्य का एक ऐसा गुण है। जिसके कारण उसकी शोभा तो बढ़ती ही है, साथ ही वह समाज में सम्मान और प्रतिष्ठा को भी अर्जित करता है तथा इससे उसको आत्मिक आनन्द की भी अनुभूति होती है।

(12) क्षीयन्ते खलु भूषणानि सततं, वाग्भूषणं भूषणम् ॥ [2009, 12, 13]
वाग्भूषणं भूषणम्।। [2007,08,09, 10, 12]

प्रसंग प्रस्तुत सूक्ति में सुसंस्कारित वाणी को ही मनुष्य का एकमात्र आभूषण बताया गया है।

अर्थ सभी आभूषण धीरे-धीरे समाप्त हो जाते हैं, सच्चा आभूषण वाणी ही है।

व्याख्या मनुष्य अपने सौन्दर्य को बढ़ाने के लिए अनेक प्रकार के आभूषणों और सुगन्धित द्रव्यों का उपयोग करता है। ये आभूषण और सुगन्धित द्रव्य तो नष्ट हो जाने वाले हैं; अत: बहुत समय तक मनुष्य के सौन्दर्य को बढ़ाने में असमर्थ होते हैं। मनुष्य की संस्कारित मधुर वाणी सदा उसे आभूषित करने वाली है; क्योंकि वह सदा मनुष्य के साथ रहती है, वह कभी नष्ट नहीं होती। उसका प्रभाव तो मनुष्य के मरने के बाद भी बना रहता है। मनुष्य अपनी प्रभावशालिनी वाणी से ही दुष्टों और अपराधियों को भी बुराई से अच्छाई के मार्ग पर ले जाता है; अत: वाणी ही सच्चा आभूषण है।

 

श्लोक का संस्कृत-अर्थ

(1) भाषासु मुख्या …………………………………………………….. तस्मादपि सुभाषितम् ॥ (श्लोक 1) [2009, 10, 14, 15]

संस्कृतार्थः अस्मिन् श्लोके संस्कृतभाषायाः महत्त्वं प्रतिपादयन् कविः कथयति-संस्कृतभाषा सर्वासु भाषासु श्रेष्ठतमा अस्ति। इयं भाषा अलौकिका मधुरगुणयुक्ता च अस्ति। तस्मात् हि तस्य काव्यं मधुरम् अस्ति। तस्मात् अपि रम्यं मधुरं च तस्य सुभाषितम् अस्ति। अस्मात् कारणात् इयं गीर्वाणभारती कथ्यते। |

(2) पृथिव्यां त्रीणि …………………………………………………….. रत्नसंज्ञा विधीयते ॥ (श्लोक 2) [2006, 09, 14]

संस्कृतार्थः कविः कथयति-भूतले जलम् अन्नं सुभाषितं च इति त्रीणि रत्नानि सन्ति। मूर्खः पाषाणखण्डेषु रत्नस्य संज्ञा विधीयते। वस्तुत: जलम् अन्नं सुभाषितञ्च अखिलं विश्वं कल्याणार्थं भवन्ति।

(3) काव्यशास्त्रविनोदेन …………………………………………………….. निद्रया कलहेन वा ॥ (श्लोक 3) [2008, 10, 12, 13, 14, 15]

संस्कृतार्थः
 कवि मूर्खाणां बुद्धिमतां च समययापनस्य अन्तरं वर्णयति यत् बुद्धिमन्तः जनाः स्वसमयं काव्यशास्त्राणां पठनेन यापयन्ति, एतद् विपरीतं मूर्खाः जनाः स्वसमयं दुराचारेण, शयनेन, विवादेन वा यापयन्ति।

(4) श्लोकस्तु श्लोंकता …………………………………………………….. “यत्र तिष्ठन्त्यसाधवः॥ (श्लोक 4) [2006, 08, 15]

संस्कृतार्थः
 अस्मिन् श्लोके कविः कथयति-यत्र सज्जनाः निवसन्ति, तत्र श्लोकः तु कीर्ति याति। यत्र दुर्जना: निवसन्ति, तत्र श्लोकस्य लकारः लुप्यते। एवं श्लोकः शोकं भवति। सदुपदेशैः सज्जना प्रभाविताः दुष्टाः न इति भावः।

(5) अप्राप्तकालं वचनं …………………………………………………….. अपमानञ्च शाश्वतम् ॥ (श्लोक 5) [2009]

संस्कृतार्थः
 अस्मिन् श्लोके कविः कथयति यत् बृहस्पतिः अपि असामयिकं वचनं ब्रुवन् बुद्धेः अधोगति शाश्वतम् अपमानञ्च प्राप्नोति। अतएव असामयिकं वचनं कदापि न ब्रूयात्।।

 

(6) वाच्यं श्रद्धासमेतस्य …………………………………………………….. रुदितोपमम् ॥ (श्लोक 6) [2011]

संस्कृतार्थः
 अस्मिन् श्लोके कविः कथयति-श्रद्धायुक्तस्य पुरुषस्य पृच्छतः सन् विशेषरूपेण वक्तव्यम्। श्रद्धाहीनस्य पुरुषस्य पृच्छतः वचनम् अरण्ये रुदितम् इव भवति।

(7) वसुमतिपतिना नु …………………………………………………….. बुधैरपि सेव्यते ॥ (श्लोक 7) [2010]

संस्कृतार्थः
 अस्मिन् श्लोके सरस्वत्याः विशेषता वर्णिता अस्ति। सरस्वती राज्ञा तथा बलवता रिपुणा न नेतुं शक्यते न च भ्रातृबन्धुभिः विभक्तुं शक्यते अपितु विद्वद्भिः सेव्यते।

(8) लक्ष्मीनं या …………………………………………………….. स नैव नैव॥ (श्लोक 8) [2007]

संस्कृतार्थः
अस्मिन् श्लोके कविः कथयति-या लक्ष्मी याचक दुःखहारिणी न भवति, सा लक्ष्मीति कथितुं न शक्यते। या विद्या विष्णुभक्तिकारिणी न भवति सापि विद्या कथितुं न शक्यते। यः पुत्रः पण्डितमण्डलाग्रणीः न भवति सः पुत्रः कथितुं न शक्यते।।

 

(9) केयूराः न विभूषयन्ति …………………………………………………….. वाग्भूषण भूषणं ॥ (श्लोक 9) [2002]
केयूराः न विभूषयन्ति …………………………………………………….. नालङ्कृता मूर्द्धजाः॥ [2005]

संस्कृतार्थः
 अस्मिनु श्लोके वाणीम् एव सर्वश्रेष्ठं भूषणं कथितम् अस्ति। कर्णाभूषणानि चन्द्रोपमः रमणीयः हारः स्नान-विलेपनादि पुष्पाणि विभूषिता मूर्द्धजा: पुरुषं न भूषयन्ति परन्तु संस्कृता वाणी एव (या अमृतोपमा मधुरावाणी) सा एव वास्तविकम् आभूषणम्। अन्यानि आभूषणानि कालक्रमेण क्षीयन्ते परन्तु वाग्भूषणं कदापि न क्षीयते।

(10) वाण्येका समलङ्करोति …………………………………………………….. वाग्भूषण भूषणम् ॥ (श्लोक 9) [2007]

संस्कृतार्थः
 अस्मिन् श्लोकाद्धे कविः कथयति–अस्मिन् संसारे एकावाणी, या अध्ययनेन विनयेन च संस्कृता धार्यते, सर्वोत्तमं भूषणं अस्ति। सा पुरुषं विभूषयन्ति। अन्यानि भूषणानि खलु नष्टाः भवन्ति। वाग्भूषणं वास्तविक भूषणम् अस्ति, यः कदापि न विनश्यति।।

10th class sanskrit shlok | संस्कृत श्लोक

जीवन–सूत्राणि नवमः पाठः

 सन्दर्भ – प्रस्तुत श्लोक हमारी पाठ्य – पुस्तक के ‘ सस्कृत-भाग  ‘ के ‘ जीवन – सूत्राणि ‘ नामक पाठ से अवतरित है ।

यहाँ यक्ष द्वारा पूछे गए प्रश्न और युधिष्ठिर द्वारा दिए गए उत्तर संगृहीत हैं ।

यक्ष प्रश्न पूछते हैं –

किंस्विद् गुरुतरं भूमेः किंस्विदुच्चतरं च खात् ?

भूमि से ( भी ) भारी क्या है ? आकाश से ( भी ) ऊँचा क्या है ?

किंस्वित् शीघ्रतरं वातात् किंस्विद् बहुतरं तृणात् ? ।। 1 ।।

वायु से ( भी ) शीघ्रगामी क्या है ? तिनकों से ( भी ) अधिक ( असंख्य ) क्या है ?

युधिष्ठिर उत्तर देते है –

माता गुरुतरा भूमेः खात् पितोच्चतरस्तथा ।

माता भूमि से ( भी ) भारी है । पिता आकाश से ( भी ) ऊँचा है ।

मनः शीघ्रतरं वातात् चिन्ता बहुतरी तृणात्।।2 ।।

मन वायु से ( भी ) शीघ्रगामी है । चिन्ता तिनकों से ( भी ) अधिक ( दुर्बल बनानेवाली ) है ।

यक्ष प्रश्न पूछते हैं –

किंस्वित् प्रवसतो मित्रं किंस्विन् मित्रं गृहे सतः ?

प्रवासी का मित्र कौन है ? गृह में निवास करते हुए अर्थात् गृहस्थ का मित्र कौन है ?

आतुरस्य च किं मित्रं किंस्विन् मित्रं मरिष्यतः ? ।। 3 ।।

रोगी का मित्र कौन है और मरनेवाले का मित्र कौन है ?

युधिष्ठिर उत्तर देते है –

सार्थः प्रवसतो मित्रं भार्या मित्रं गृहे सतः ।

सहयात्रियों का समूह प्रवासी का मित्र है । गृह में निवास करनेवाले अर्थात् गृहस्थ की पत्नी मित्र है ।

आतुरस्य भिषक् मित्रं दानं मित्रं मरिष्यतः।।4 ।।

रोगी का मित्र वैद्य है और मरनेवाले का मित्र दान है ।

यक्ष प्रश्न पूछते हैं –

 किंस्विदेकपदं धर्म्यम् किंस्विदेकपदं यशः ?

धर्म का मुख्य स्थान क्या है ? यश का मुख्य स्थान क्या है ?

किंस्विदेकपदं स्वय॑म् किंस्विदेकपदं सुखम् ? ।। 5 ।।

स्वर्ग का मुख्य स्थान क्या है ? और सुख का मुख्य स्थान क्या है ?

युधिष्ठिर उत्तर देते है –

दाक्ष्यमेकपदं धर्म्यम् दानमेकपदं यशः ।

धर्म का मुख्य स्थान उदारता है , यश का मुख्य स्थान दान है ,

सत्यमेकपदं स्वयं शीलमेकपदं सुखम्।।6 ।।

स्वर्ग का मुख्य स्थान सत्य है और सुख का मुख्य स्थान शील है ।

यक्ष प्रश्न पूछते हैं –

धान्यानामुत्तमं किंस्विद् धनानां स्यात् किमुत्तमम् ?

अन्नों में उत्तम ( अन्न ) क्या है ? धन में उत्तम ( धन ) क्या है ?

लाभानामुत्तमं किं स्यात् सुखानां स्यात् किमुत्तमम् ? ।। 7 ।।

लाभों में उत्तम ( लाभ ) क्या है ? सुखों में उत्तम ( सुख ) क्या है ?

युधिष्ठिर उत्तर देते है –

धान्यानामुत्तमं दाक्ष्यं धनानामुत्तमं श्रुतम् ।

अन्नों में उत्तम ( अन्न ) चतुरता है । धनों में उत्तम ( धन ) शास्त्र है ।

लाभानां श्रेय आरोग्यं सुखानां तुष्टिरुत्तमा।।8 ।।

लाभों में उत्तम ( लाभ ) आरोग्य है । सुखों में उत्तम ( सुख ) सन्तोष है ।

यक्ष प्रश्न पूछते हैं –

किं नु हित्वा प्रियो भवति ? किन्नु हित्वा न शोचति ।

क्या त्यागकर ( मनुष्य ) प्रिय हो जाता है ? क्या त्यागकर शोक नहीं करता ?

किं नु हित्वार्थवान् भवति ? किन्नु हित्वा सुखी भवेत्।।9 ।।

क्या त्यागकर धनवान् होता है ? क्या त्यागकर सुखी हो जाता है ?

युधिष्ठिर उत्तर देते है –

मानं हित्वा प्रियो भवति क्रोधं हित्वा न शोचति ।

अभिमान छोड़कर ( मनुष्य ) प्रिय हो जाता है , क्रोध त्यागकर शोक नहीं करता है ,

कामं हित्वार्थवान् भवति लोभं हित्वा सुखी भवेत्।।10 ।।

कामना ( इच्छा ) त्यागकर धनवान् होता है और लोभ छोड़कर सुखी होता है ।

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