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Chhand In Hindi | छंद के प्रकार , उदाहरण जानिए आसान शब्दो मे

Chhand In Hindi

Chhand In Hindi – आज हम आप सभी को छंद के बारे मे बताएँगे वो भी आसान शब्दो मे जिससे आप सभी को यह अच्छे से समझ आ जाए ओर दुबारा पढ़ने ओर याद करने की जरूरत न पड़े

छंद किसे कहते हैं Chhand In Hindi

छंद शब्द ‘चद ‘धातु से बना है जिसका अर्थ होता है – खुश करना। हिंदी साहित्य के अनुसार अक्षर , अक्षरों की संख्या , मात्रा , गणना , यति , गति से संबंधित किसी विषय पर रचना को छंद कहा जाता है।

छंद के अंग

1. चरण और पाद  2. वर्ण और मात्रा

चरण या पाद :- एक छंद में चार चरण होते हैं। चरण छंद का चौथा हिस्सा होता है। चरण को पाद भी कहा जाता है। हर पाद में वर्णों या मात्राओं की संख्या निश्चित होती है।

चरण के प्रकार

1. समचरण 2. विषमचरण

1. समचरण :- दूसरे और चौथे चरण को समचरण कहते हैं।
2. विषमचरण :- पहले और तीसरे चरण को विषमचरण कहा जाता है।

वर्ण और मात्रा :- छंद के चरणों को वर्णों की गणना के अनुसार व्यवस्थित किया जाता है। छंद में जो अक्षर प्रयोग होते हैं उन्हें वर्ण कहते हैं।

मात्रा की दृष्टि से वर्ण के प्रकार

1. लघु या ह्रस्व 2. गुरु या दीर्घ

1. लघु या ह्रस्व :- जिन्हें बोलने में कम समय लगता है उसे लघु या ह्रस्व वर्ण कहते हैं। इसका चिन्ह (1) होता है।

2. गुरु या दीर्घ :- जिन्हें बोलने में लघु वर्ण से ज्यादा समय लगता है उन्हें गुरु या दीर्घ वर्ण कहते हैं। इसका चिन्ह (:) होता है।

  1.  मात्रा
  2.  यति
  3. गति
  4. तुक
  5. गण
मात्रा

छंद में मात्रा का अर्थ :- वर्ण के उच्चारण में जो समय लगता है उसे ही मात्रा कहा जाता है। अथार्त वर्ण को बोलने में जो समय लगता है उसे मात्रा कहते हैं अथार्त किसी वर्ण के उच्चारण काल की अवधि मात्रा कहलाती है।

उपेन्द्रव्रजा छंद :- इसके प्रत्येक चरण में 11 वर्ण , 1 नगण , 1 तगण , 1 जगण और बाद में 2 गुरु होता हैं।
जैसे :- “पखारते हैं पद पद्म कोई, चढ़ा रहे हैं फल -पुष्प कोई। करा रहे हैं पय-पान कोई उतारते श्रीधर आरती हैं।।”

अरिल्ल छंद :- हर चरण में 16 मात्राएँ होती हैं। इसके अंत में लघु या यगण होना चाहिए।
जैसे :- “मन में विचार इस विधि आया। कैसी है यह प्रभुवर माया। क्यों आगे खड़ी है विषम बाधा। मैं जपता रहा, कृष्ण-राधा।।

लावनी छंद :- इसके हर चरण में 22 मात्राएँ और चरण के अंत में गुरु होते हैं।
जैसे :- “धरती के उर पर जली अनेक होली। पर रंगों से भी जग ने फिर नहलाया। मेरे अंतर की रही धधकती ज्वाला। मेरे आँसू ने ही मुझको बहलाया।।”

राधिका छंद :- इसके हर चरण में 22 मात्राएँ होती हैं। 13 और 9 पर विराम होता है।
जैसे :- “बैठी है वसन मलीन पहिन एक बाला। बुरहन पत्रों के बीच कमल की माला। उस मलिन वसन म, अंग-प्रभा दमकीली। ज्यों धूसर नभ में चंद्रप्रभा चमकीली।।”

त्रोटक छंद :- इसके हर चरण में 12 मात्रा और 4 सगण होते हैं।
जैसे :- “शशि से सखियाँ विनती करती, टुक मंगल हो विनती करतीं। हरि के पद-पंकज देखन दै पदि मोटक माहिं निहारन दै।।”

भुजंगी छंद :- हर चरण में 11 वर्ण , तीन सगण , एक लघु और एक गुरु होता है।
जैसे :- “शशि से सखियाँ विनती करती, टुक मंगल हो विनती करतीं। हरि के पद-पंकज देखन दै पदि मोटक माहिं निहारन दै।।”

वियोगिनी छंद :- इसके सम चरण में 11-11 और विषम चरण में 10 वर्ण होते हैं। विषम चरणों में दो सगण , एक जगण , एक सगण और एक लघु व एक गुरु होते हैं।
जैसे :- “विधि ना कृपया प्रबोधिता, सहसा मानिनि सुख से सदा करती रहती सदैव ही करुण की मद-मय साधना।।”

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वंशस्थ छंद :- इसके हर चरण में 12 वर्ण , एक नगण , एक तगण , एक जगण और एक रगण होते
जैसे :- “गिरिन्द्र में व्याप्त विलोकनीय थी, वनस्थली मध्य प्रशंसनीय थी अपूर्व शोभा अवलोकनीय थी असेत जम्बालिनी कूल जम्बुकीय।।”

शिखरिणी छंद :- इसमें 17 वर्ण होते हैं। इसके हर चरण में यगण , मगण , नगण , सगण , भगण , लघु और गुरु होता है।

यति

पद्य का पाठ करते समय गति को तोडकर जो विश्राम दिया जाता है उसे यति कहते हैं। सरल शब्दों में छंद का पाठ करते समय जहाँ पर कुछ देर के लिए रुकना पड़ता है उसे यति कहते हैं। इसे विराम और विश्राम भी कहा जाता है।

इनके लिए (,) , (1), (11), (?) , (!) चिन्ह निश्चित होते हैं। हर छंद में बीच में रुकने के लिए कुछ स्थान निश्चित होते हैं इसी रुकने को विराम या यति कहा जाता है। यति के ठीक न रहने से छंद में यतिभंग दोष आता है।

गति

पद्य के पथ में जो बहाव होता है उसे गति कहते हैं। अथार्त किसी छंद को पढ़ते समय जब एक प्रवाह का अनुभव होता है उसे गति या लय कहा जाता है। हर छंद में विशेष प्रकार की संगीतात्मक लय होती है जिसे गति कहते हैं। इसके ठीक न रहने पर गतिभंग दोष हो जाता है।

तुक

समान उच्चारण वाले शब्दों के प्रयोग को ही तुक कहा जाता है। छंद में पदांत के अक्षरों की समानता तुक कहलाती है।

तुक के भेद :- 1.तुकांत कविता  2.अतुकांत कविता

तुकांत कविता :- जब चरण के अंत में वर्गों की आवृति होती है उसे तुकांत कविता कहते हैं। पद्य प्राय: तुकांत होते हैं।
जैसे :- ” हमको बहुत ई भाती हिंदी। हमको बहुत है प्यारी हिंदी।”

अतुकांत कविता :- जब चरण के अंत में वर्गों की आवृति नहीं होती उसे अतुकांत कविता कहते हैं। नई कविता अतुकांत होती है।
जैसे :- “काव्य सर्जक हूँ प्रेरक तत्वों के अभाव में लेखनी अटक गई हैं काव्य-सृजन हेतु तलाश रहा हूँ उपादान।”

गण

मात्राओं और वर्गों की संख्या और क्रम की सुविधा के लिए तीन वर्गों के समूह को गण मान लिया जाता है। वर्णिक छंदों की गणना गण के क्रमानुसार की जाती है। तीन वर्णों का एक गण होता है। गणों की संख्या आठ होती है।

  1. यगण
  2. तगण
  3. लगण
  4. रगण
  5. जगण
  6. भगण
  7. नगण
  8. सगण आदि

गण को जानने के लिए पहले उस गण के पहले तीन अक्षर को लेकर आगे के दो अक्षरों को मिलाकर वह गण बन जाता है।

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छंद के प्रकार
  • मात्रिक छंद
  • वर्णिक छंद
  • वर्णिक वृत
  • छंद मुक्त छंद

मात्रिक छंद :- मात्रा की गणना के आधार पर की गयी पद की रचना को मात्रिक छंद कहते हैं। अथार्त जिन छंदों की रचना मात्राओं की गणना के आधार पर की जाती है उन्हें मात्रिक छंद कहते हैं। जिनमें मात्राओं की संख्या , लघु-गुरु , यति -गति के आधार पर पद रचना की जाती है उसे मात्रिक छंद कहते हैं।
जैसे :- ” बंदऊं गुरूँ पद पदुम परागा। सुरुचि सुबास सरस अनुरागा।। अमिअ मुरियम चूरन चारू। समन सकल भव रुज परिवारू||”

मात्रिक छंद के भेद
  1. सममात्रिक छंद
  2. अर्धमात्रिक छंद
  3. विषममात्रिक छंद

1. सममात्रिक छंद :- जहाँ पर छंद में सभी चरण समान होते हैं उसे सममात्रिक छंद कहते हैं।
जैसे :- “मुझे नहीं ज्ञात कि मैं कहाँ हूँ प्रभो! यहाँ हूँ अथवा वहाँ हूँ।”

2. अर्धमात्रिक छंद :- जिसमें पहला और तीसरा चरण एक समान होता है तथा दूसरा और चौथा चरण उनसे अलग होते हैं लेकिन आपस में एक जैसे होते हैं उसे अर्धमात्रिक छंद कहते हैं।

3. विषय मात्रिक छंद :- जहाँ चरणों में दो चरण अधिक समान न हों उसे विषम मात्रिक छंद कहते हैं। ऐसे छंद प्रचलन में कम होते हैं।

वर्णिक छंद

जिन छंदों की रचना को वर्णों की गणना और क्रम के आधार पर किया जाता है उन्हें वर्णिक छंद कहते हैं।

वृतों की तरह इनमे गुरु और लघु का कर्म निश्चित नहीं होता है बस वर्ण संख्या निश्चित होती है। ये वर्गों की गणना पर आधारित होते हैं। जिनमे वर्गों की संख्या , क्रम , गणविधान , लघु-गुरु के आधार पर रचना होती है।

जैसे :- (i) दुर्मिल सवैया। (ii) ” प्रिय पति वह मेरा , प्राण प्यारा कहाँ है। दुःख-जलधि निमग्ना , का सहारा कहाँ है। अब तक जिसको मैं , देख के जी सकी हूँ। वह ह्रदय हमारा , नेत्र तारा कहाँ है।

वर्णिक वृत छंद

इसमें वर्णों की गणना होती है। इसमें चार चरण होते हैं और प्रत्येक चरण में आने वाले लघु-गुरु का क्रम सुनिश्चित होता है। इसे सम छंद भी कहते हैं।
जैसे :- मत्तगयन्द सवैया।

मुक्त छंद

मुक्त छंद को आधुनिक युग की देन माना जाता है। जिन छंदों में वर्णों और मात्राओं का बंधन नहीं होता उन्हें मुक्तक छंद कहते हैं अथार्त हिंदी में स्वतंत्र रूप से आजकल लिखे जाने वाले छंद मुक्त छंद होते हैं।

चरणों की अनियमित , असमान , स्वछन्द गति और भाव के अनुकूल यति विधान ही मुक्त छंद की विशेषता है। इसे रबर या केंचुआ छंद भी कहते हैं। इनमे न वर्गों की और न ही मात्राओं की गिनती होती है।

जैसे :-” वह आता दो टूक कलेजे के करता पछताता पथ पर आता। पेट पीठ दोनों मिलकर हैं एक , चल रहा लकुटिया टेक, मुट्ठी भर दाने को भूख मिटाने को मुँह फटी पुरानी झोली का फैलता दो टूक कलेजे के कर्ता पछताता पथ पर आता।”

प्रमुख मात्रिक छंद

1. दोहा छंद 2. सोरठा छंद 3. रोला छंद 4. गीतिका छंद 5. हरिगीतिका छंद 6. उल्लाला छंद 7. चौपाई छंद

8. बरवै (विषम) छंद 9. छप्पय छंद 10. कुंडलियाँ छंद 11. दिगपाल छंद 12. आल्हा या वीर छंद 13. सार छंद 14. तांटक छंद 15. रूपमाला छंद 16. त्रिभंगी छंद

1. दोहा छंद :- यह अर्धसममात्रिक छंद होता है। ये सोरठा छंद के विपरीत होता है। इसमें पहले और तीसरे चरण में 13-13 तथा दूसरे और चौथे चरण में 11-11 मात्राएँ होती हैं। इसमें चरण के अंत में लघु (1) होना जरूरी होता है।

जैसे :- (i) SII SS SIS SS SIISI “कारज धीरे होत है, काहे होत अधीर। III SI MIS SIISS SI समय पाय तरुवर फरै, केतक सींचो नीर ||”
(ii) तेरो मुरली मन हरो, घर अँगना न सुहाय॥ श्रीगुरू चरन सरोज रज, निज मन मुकुर सुधारि ! बरनउँ रघुबर बिमल जसु जो दायकु फल चारि !! रात-दिवस, पूनम-अमा, सुख-दुःख, छाया-धूप। यह जीवन बहुरूपिया, बदले कितने रूप॥

2. सोरठा छंद :- यह अर्धसममात्रिक छंद होता है। ये दोहा छंद के विपरीत होता है। इसमें पहले और तीसरे चरण में 11-11 तथा दूसरे और चौथे चरण में 13-13 मात्राएँ होती हैं। यह दोहा का उल्टा होता है। विषम चरणों के अंत में एक गुरु और एक लघु मात्रा का होना जरूरी होता है।तुक प्रथम और तृतीय चरणों में होता है।

जैसे :- (i) IS I SS SISS II ISI SI “कहै जु पावै कौन , विद्या धन उद्दम बिना।
S SS S SIIS ISS S IS ज्यों पंखे की पौन, बिना डुलाए ना मिलें।”
(ii) जो सुमिरत सिधि होय, गननायक करिबर बदन। करहु अनुग्रह सोय, बुद्धि रासि सुभ गुन सदन॥

3. रोला छंद :- यह एक मात्रिक छंद होता है। इसमें चार चरण होते हैं। इसके प्रत्येक चरण में 11 और 13 के क्रम से 24 मात्राएँ होती हैं। इसे अंत में दो गुरु और दो लघु वर्ण होते हैं।

जैसे –  (i) SSII ISI || || || SIIS “नीलाम्बर परिधान, हरित पट पर सुन्दर है। सूर्य चन्द्र युग-मुकुट मेखला रत्नाकर है। नदियाँ प्रेम-प्रवाह, फूल तारे मंडन है। बंदी जन खग-वृन्द, शेष फन सिंहासन है।”
(ii) यही सयानो काम, राम को सुमिरन कीजै। पर-स्वारथ के काज, शीश आगे धर दीजै॥

4. गीतिका छंद :- यह मात्रिक छंद होता है। इसके चार चरण होते हैं। हर चरण में 14 और 12 के करण से 26 मात्राएँ होती हैं। अंत में लघु और गुरु होता है।

जैसे :- SSS SISS SI IIS SIS “हे प्रभो आनंददाता ज्ञान हमको दीजिये। शीघ्र सारे दुर्गुणों को दूर हमसे कीजिये। लीजिए हमको शरण में, हम सदाचारी बने। ब्रह्मचारी, धर्मरक्षक वीर व्रतधारी बनें।”

5. हरिगीतिका छंद :- यह मात्रिक छंद होता है। इसमें चार चरण होते हैं। इसके हर चरण में 16 और 12 के क्रम से 28 मात्राएँ होती हैं। इसके अंत में लघु गुरु का प्रयोग अधिक प्रसिद्ध है।

जैसे – SS II SIIS S S III SIS IIS “मेरे इस जीवन की है तू, सरस साधना कविता। मेरे तरु की तू कुसुमित , प्रिय कल्पना लतिका।
मधुमय मेरे जीवन की प्रिय,है तू कल कामिनी। मेरे कुंज कुटीर द्वार की, कोमल चरण-गामिनी।”

6. उल्लाला छंद :- यह मात्रिक छंद होता है। इसके हर चरण में 15 और 13 के क्रम से 28 मात्राएँ होती है।

जैसे :- IIS IISI ISIS ISS II SIS “करते अभिषेक पयोद हैं, बलिहारी इस वेश की। हे मातृभूमि! तू सत्य ही, सगुण-मूर्ति सर्वेश की।”

7. चौपाई छंद :- यह एक मात्रिक छंद होता है। इसमें चार चरण होते हैं। इसके हर चरण में 16 मात्राएँ होती हैं। चरण के अंत में गुरु या लघु नहीं होता है लेकिन दो गुरु और दो लघु हो सकते हैं। अंत में गुरु वर्ण होने से छंद में रोचकता आती है।

जैसे :- (i) || || SI III IISS “इहि विधि राम सबहिं समुझावा गुरु पद पदुम हरषि सिर नावा।”
(ii) बंदउँ गुरु पद पदुम परागा। सुरुचि सुबास सरस अनुराग॥ अमिय मूरिमय चूरन चारू। समन सकल भव रुज परिवारू॥

8. विषम छंद :- इसमें पहले और तीसरे चरण में 12 और दूसरे और चौथे चरण में 7 मात्राएँ होती हैं। सम चरणों के अंत में जगण और तगण के आने से मिठास बढती है। यति को प्रत्येक चरण के अंत में रखा जाता है।

जैसे :- “चम्पक हरवा अंग मिलि अधिक सुहाय। जानि परै सिय हियरे, जब कुम्हिलाय।।”

9. छप्पय छंद :- इस छंद में 6 चरण होते हैं। पहले चार चरण रोला छंद के होते हैं और अंत के दो चरण उल्लाला छंद के होते हैं। प्रथम चार चरणों में 24 मात्राएँ और बाद के दो चरणों में 26-26 या 28-28 मात्राएँ होती हैं।

जैसे :- “नीलाम्बर परिधान हरित पट पर सुन्दर है। सूर्य-चन्द्र युग मुकुट, मेखला रत्नाकर है।
नदिया प्रेम-प्रवाह, फूल -तो मंडन है। बंदी जन खग-वृन्द, शेषफन सिंहासन है। करते अभिषेक पयोद है, बलिहारी इस वेश की। हे मातृभूमि! तू सत्य ही,सगुण मूर्ति सर्वेश की।।”

10. कुंडलियाँ छंद :- कुंडलियाँ विषम मात्रिक छंद होता है। इसमें 6 चरण होते हैं। शुरू के 2 चरण दोहा और बाद के 4 चरण उल्लाला छंद के होते हैं। इस तरह हर चरण में 24 मात्राएँ होती हैं।

जैसे :- (i) “घर का जोगी जोगना, आन गाँव का सिद्ध। बाहर का बक हंस है, हंस घरेलू गिद्ध हंस घरेलू गिद्ध , उसे पूछे ना कोई। जो बाहर का होई, समादर ब्याता सोई। चित्तवृति यह दूर, कभी न किसी की होगी। बाहर ही धक्के खायेगा , घर का जोगी।।”

11. दिगपाल छंद :- इसके हर चरण में 12-12 के विराम से 24 मात्राएँ होती हैं।
जैसे :- “हिमाद्रि तुंग-श्रृंग से प्रबुद्ध शुद्ध भारती। स्वयं प्रभा समुज्ज्वला स्वतंत्रता पुकारती। अमर्त्य वीर पुत्र तुम, दृढ प्रतिज्ञ सो चलो। प्रशस्त पुण्य-पंथ है, बढ़े चलो-बढ़े चलो।।”

12. आल्हा या वीर छंद :- इसमें 16 -15 की यति से 31 मात्राएँ होती हैं।

13. सार छंद :- इसे ललित पद भी कहते हैं। सार छंद में 28 मात्राएँ होती हैं। इसमें 16-12 पर यति होती है और बाद में दो गुरु होते हैं।

14. ताटंक छंद :- इसके हर चरण में 16,14 की यति से 30 मात्राएँ होती हैं।

15. रूपमाला छंद :- इसके हर चरण में 24 मात्राएँ होती हैं। 14 और 10 मैट्रन पर विराम होता है। अंत में गुरु लघु होना चाहिए।

16. त्रिभंगी छंद :- यह छंद 32 मात्राओं का होता है। 10,8,8,6 पर यति होती है और अंत में गुरु होता है।

प्रमुख वर्णिक छंद : – 1. सवैया छंद 2. कवित्त छंद 3. द्रुत विलम्बित छंद 4. मालिनी छंद 5. मंद्रकांता छंद 6. इंव्रजा छंद 7. उपेंद्रवज्रा छंद 8. अरिल्ल छंद 9. लावनी छंद 10. राधिका छंद 11. त्रोटक छंद 12. भुजंग छंद 13. वियोगिनी छंद 14. वंशस्थ छंद 15. शिखरिणी छंद 16. शार्दुल विक्रीडित छंद 17. मत्तगयंग छंद

1. सवैया छंद :- इसके हर चरण में 22 से 26 वर्ण होते हैं। इसमें एक से अधिक छंद होते हैं। ये अनेक प्रकार के होते हैं और इनके नाम भी अलग -अलग प्रकार के होते हैं। सवैया में एक ही वर्णिक गण को बारबार आना चाहिए। इनका निर्वाह नहीं होता है।

जैसे :- “लोरी सरासन संकट कौ, सुभ सीय स्वयंवर मोहि बरौ। नेक ताते बढयो अभिमानमहा, मन फेरियो नेक न स्न्ककरी। सो अपराध परयो हमसों, अब क्यों सुधरे तुम ह धौ कहौ। बाहुन देहि कुठारहि केशव, आपने धाम को पंथ गहौ।।”

2. मन हर , मनहरण , घनाक्षरी , कवित्त छंद :- यह वर्णिक सम छंद होता है। इसके हर चरण में 31से 33 वर्ण होते हैं और अंत में तीन लघु होते हैं। 16, 17 वें वर्ण पर विराम होता है।

जैसे :- “मेरे मन भावन के भावन के ऊधव के आवन की सुधि ब्रज गाँवन में पावन जबै लगीं। कहै रत्नाकर सु ग्वालिन की झौर-झौर दौरि-दौरि नन्द पौरि,आवन सबै लगीं। उझकि-उझकि पद-कंजनी के पंजनी पै, पेखि-पेखि पाती,छाती छोहन सबै लगीं।

3. द्रुत विलम्बित छंद :- हर चरण में 12 वर्ण , एक नगण , दो भगण तथा एक सगण होते हैं।
जैसे :- “दिवस का अवसान समीप था, गगन था कुछ लोहित हो चला। तरु शिखा पर थी अब राजती, कमलिनी कुल-वल्लभ की प्रभा।।”

4. मालिनी छंद :- इस वर्णिक सम वृत छंद में 15 वर्ण होते हैं दो तगण , एक मगण , दो यगण होते हैं। आठ , सात वर्ण एवं विराम होता है।
जैसे :- “प्रभुदित मथुरा के मानवों को बना के, सकुशल रह के औ विध्न बाधा बचाके। निज प्रिय सूत दोनों , साथ ले के सुखी हो, जिस दिन पलटेंगे, गेह स्वामी हमारे।।”

5. मंदाक्रांता छंद :- इसके हर चरण में 17 वर्ण होते हैं। एक भगण , एक नगण , दो तगण , और दो गुरु होते हैं। 5, 6 तथा 7 वें वर्ण पर विराम होता है।
जैसे :- “कोई क्लांता पथिक ललना चेतना शून्य होके, तेरे जैसे पवन में , सर्वथा शान्ति पावे। तो तू हो के सदय मन, जा उसे शान्ति देना, ले के गोदी सलिल उसका, प्रेम से तू सुखाना।।”

6. इन्द्रव्रजा छंद :- इसके प्रत्येक चरण में 11 वर्ण , दो जगण और बाद में 2 गुरु होते हैं।
जैसे :- “माता यशोदा हरि को जगावै। प्यारे उठो मोहन नैन खोलो।
द्वारे खड़े गोप बुला रहे हैं। गोविन्द, दामोदर माधवेति।।”

16. शार्दुल विक्रीडित छंद :- इसमें 19 वर्ण होते हैं। 12 , 7 वर्गों पर विराम होता है। हर चरण में मगण, सगण , जगण , सगण , तगण , और बाद में एक गुरु होता है।

17. मत्तगयंग छंद :- इसमें 23 वर्ण होते हैं। हर चरण में सात सगण और दो गुरु होते हैं।
काव्य में छंद का महत्व :छंद से ह्रदय का संबंध बोध होता है। छंद से मानवीय भावनाएँ झंकृत होती हैं। छंदों में स्थायित्व होता है। छंद के सरस होने के कारण मन को भाते हैं।

जैसे :- भभूत लगावत शंकर को, अहिलोचन मध्य परौ झरि कै। अहि की फुफकार लगी शशि को, तब अंमृत बूंद गिरौ चिरि कै। तेहि ठौर रहे मृगराज तुचाधर, गर्जत भे वे चले उठि कै।

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